दोहा 61
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥ बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥१॥
भावार्थ
[ दक्षका निमन्त्रण पाकर ] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीको छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले॥१॥
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥ सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥२॥
भावार्थ
सतीजीने देखा अनेकों प्रकारके सुन्दर विमान आकाशमें चले जा रहे हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियोंका ध्यान छूट जाता है॥२॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥ जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥३॥
भावार्थ
सतीजीने [ विमानोंमें देवताओंके जानेका कारण ] पूछा, तब शिवजीने सब बातें बतलायीं। पिताके यज्ञकी बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ॥३॥
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥ बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥४॥
भावार्थ
क्योंकि उनके हृदयमें पतिद्वारा त्यागी जानेका बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरसमें सनी हुई मनोहर वाणीसे बोलीं— ॥४॥
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥६१॥
भावार्थ
हे प्रभो! मेरे पिताके घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ॥६१॥
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