दोहा 5
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥ बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥१॥
भावार्थ
मैंने अपनी ओरसे विनती की है, परन्तु वे अपनी ओरसे कभी नहीं चूकेंगे। कौओंको बड़े प्रेमसे पालिये; परन्तु वे क्या कभी मांसके त्यागी हो सकते हैं?॥१॥
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥२॥
भावार्थ
अब मैं संत और असंत दोनोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अन्तर यह है कि एक ( संत ) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे ( असंत ) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं। ( अर्थात् संतोंका बिछुड़ना मरनेके समान दुःखदायी होता है और असंतोंका मिलना )॥२॥
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥३॥
भावार्थ
दोनों (संत और असंत) जगत्में एक साथ पैदा होते हैं; पर [ एक साथ पैदा होनेवाले ] कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्शसे सुख देता है, किन्तु जोंक शरीरका स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृतके समान ( मृत्युरूपी संसारसे उबारनेवाला ) और असाधु मदिराके समान ( मोह,प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला ) है, दोनोंको उत्पन्न करनेवाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है। [ शास्त्रोंमें समुद्रमन्थनसे ही अमृत और मदिरा दोनोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ]॥ ३ ॥
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥४॥ गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥५॥
भावार्थ
भले और बुरे अपनी-अपनी करनीके अनुसार सुन्दर यश और अपयशकी सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गङ्गाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापोंकी नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है॥ ४-५ ॥
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥५॥
भावार्थ
भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचताको ही ग्रहण किये रहता है। अमृतकी सराहना अमर करनेमें होती है और विषकी मारनेमें॥ ५ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें