दोहा 41
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥ नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥१॥
भावार्थ
श्रीसीताजीके स्वयंवरकी जो सुन्दर कथा है, वही इस नदीमें सुहावनी छबि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदीकी नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं॥१॥
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥ घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥२॥
भावार्थ
इस कथाको सुनकर पीछे जो आपसमें चर्चा होती है, वही इस नदीके सहारे-सहारे चलनेवाले यात्रियोंका समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजीका क्रोध इस नदीकी भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं॥२॥
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥ कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥३॥
भावार्थ
भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्साह ही इस कथा-नदीकी कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभीको सुख देनेवाली है। इसके कहने-सुननेमें जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मनसे इस नदीमें नहाते हैं॥३॥
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥ काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥४॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलकके लिये जो मङ्गल साज सजाया गया, वही मानो पर्वके समय इस नदीपर यात्रियोंके समूह इकट्ठे हुए हैं। कैकेयीकी कुबुद्धि ही इस नदीमें काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी॥४॥
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग। कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥४१॥
भावार्थ
सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातोंको शान्त करनेवाला भरतजीका चरित्र नदी-तटपर किया जानेवाला जपयज्ञ है। कलियुगके पापों और दुष्टोंके अवगुणोंके जो वर्णन हैं वे ही इस नदीके जलका कीचड़ और बगुले-कौए हैं॥४१॥
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