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दोहा 39

चौ०

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥ जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥१॥

भावार्थ

यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँतक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नींदरूपी जूड़ी आ जाती है। हृदयमें मूर्खतारूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह अभागा स्नान नहीं कर पाता॥१॥

चौ०

करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥ जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥२॥

भावार्थ

उससे उस सरोवरमें स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमानसहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [ वहाँका हाल ] पूछने आता है, तो वह [ अपने अभाग्यकी बात न कहकर ] सरोवरकी निन्दा करके उसे समझाता है॥२॥

चौ०

सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥ सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥३॥

भावार्थ

ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते ( बाधा नहीं देते ) जिसे श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर कृपाकी दृष्टिसे देखते हैं। वही आदरपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करता है और महान्‌ भयानक त्रितापसे ( आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापोंसे ) नहीं जलता॥३॥

चौ०

ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ॥ जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥४॥

भावार्थ

जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते। हे भाई! जो इस सरोवरमें स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे॥४॥

चौ०

अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥ भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥५॥

भावार्थ

ऐसे मानस-सरोवरको हृदयके नेत्रोंसे देखकर और उसमें गोता लगाकर कविकी बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदयमें आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा आनन्दका प्रवाह उमड़ आया॥५॥

चौ०

चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥ सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥६॥

भावार्थ

उससे वह सुन्दर कवितारूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजीका निर्मल यशरूपी जल भरा है। इस ( कवितारूपिणी नदी ) का नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ है। लोकमत और वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं॥६॥

चौ०

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥७॥

भावार्थ

यह सुन्दर मानस-सरोवरकी कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुगके [ छोटे-बड़े ] पापरूपी तिनकों और वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाली है॥७॥

दो०

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल॥३९॥

भावार्थ

तीनों प्रकारके श्रोताओंका समाज ही इस नदीके दोनों किनारोंपर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतोंकी सभा ही सब सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ अनुपम अयोध्याजी है॥३९॥

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