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दोहा 37

चौ०

सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥ रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥१॥

भावार्थ

सात काण्ड ही इस मानस-सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्रीरघुनाथजीकी निर्गुण ( प्राकृतिक गुणोंसे अतीत ) और निर्बाध ( एकरस ) महिमाका जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है॥ १॥

चौ०

राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥ पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥२॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीका यश अमृतके समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरङ्गोंका मनोहर विलास है। सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन ( कमलिनी ) हैं और कविताकी युक्तियाँ सुन्दर मणि ( मोती ) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं॥ २॥

चौ०

छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥ अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥३॥

भावार्थ

जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलोंके समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग ( पुष्परज ), मकरन्द ( पुष्परस ) और सुगन्ध हैं॥ ३॥

चौ०

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥ धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥४॥

भावार्थ

सत्कर्मों ( पुण्यों ) के पुञ्ज भौंरोंकी सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविताकी ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकारकी मनोहर मछलियाँ हैं॥ ४॥

चौ०

अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥ नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥५॥

भावार्थ

अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—ये चारों, ज्ञान-विज्ञानका विचारके कहना, काव्यके नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्यके प्रसंग—ये सब इस सरोवरके सुन्दर जलचर जीव हैं॥ ५॥

चौ०

सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जलबिहग समाना॥ संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥६॥

भावार्थ

सुकृती ( पुण्यात्मा ) जनोंके, साधुओंके और श्रीरामनामके गुणोंका गान ही विचित्र जल-पक्षियोंके समान है। संतोंकी सभा ही इस सरोवरके चारों ओरकी अमराई ( आमकी बगीचियाँ ) हैं और श्रद्धा वसन्त-ऋतुके समान कही गयी है॥ ६॥

चौ०

भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥ सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥७॥

भावार्थ

नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम ( इन्द्रियनिग्रह ) लताओंके मण्डप हैं। मनका निग्रह, यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ), नियम ( शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है। ऐसा वेदोंने कहा है॥ ७॥

चौ०

औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥८॥

भावार्थ

इस ( रामचरितमानस ) में और भी जो अनेक प्रसङ्गोंकी कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं॥ ८॥

दो०

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥३७॥

भावार्थ

कथामें जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्वारा उनको सींचता है॥ ३७॥

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