दोहा 360
सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥ नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥१॥
भावार्थ
अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त ) शोधकर सुन्दर कङ्कण खोले गये। मङ्गल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए ( अर्थात् बहुत हुए )। इस प्रकार नित्य नये सुखको देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्यामें जन्म पानेके लिये ब्रह्माजीसे याचना करते हैं॥ १ ॥
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥ दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥२॥
भावार्थ
विश्वामित्रजी नित्य ही चलना ( अपने आश्रम जाना ) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजीके स्नेह और विनयवश रह जाते हैं। दिनोंदिन राजाका सौगुना भाव ( प्रेम ) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं॥ २ ॥
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥ नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥३॥
भावार्थ
अन्तमें जब विश्वामित्रजीने विदा माँगी, तब राजा प्रेममग्न हो गये और पुत्रोंसहित आगे खड़े हो गये। [ वे बोले— ] हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रोंसहित आपका सेवक हूँ॥ ३ ॥
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसनु देत रहब मुनि मोहू॥ अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥४॥
भावार्थ
हे मुनि! लड़कोंपर सदा स्नेह करते रहियेगा और मुझे भी दर्शन देते रहियेगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियोंसहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजीके चरणोंपर गिर पड़े, [ प्रेमविह्वल हो जानेके कारण ] उनके मुँहसे बात नहीं निकलती॥ ४ ॥
दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥ रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥ ५॥
भावार्थ
ब्राह्मण विश्वामित्रजीने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीतिकी रीति कही नहीं जाती। सब भाइयोंको साथ लेकर श्रीरामजी प्रेमके साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे॥ ५ ॥
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥३६०॥
भावार्थ
गाधिकुलके चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ श्रीरामचन्द्रजीके रूप, राजा दशरथजीकी भक्ति, [ चारों भाइयोंके ] विवाह और [ सबके उत्साह और आनन्दको मन-ही-मन सराहते जाते हैं॥ ३६० ॥
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