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दोहा 358

चौ०

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥ घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥१॥

भावार्थ

नींदमें भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो सन्ध्याके समयका लाल कमल सोह रहा हो। स्त्रियाँ घर-घर जागरण कर रही हैं और आपसमें ( एक-दूसरीको ) मङ्गलमयी गालियाँ दे रही हैं॥ १ ॥

चौ०

पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥ सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥२॥

भावार्थ

रानियाँ कहती हैं—हे सजनी! देखो, [ आज ] रात्रिकी कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! [ यों कहती हुई ] सासुएँ सुन्दर बहुओंको लेकर सो गयीं, मानो सर्पोंने अपने सिरकी मणियोंको हृदयमें छिपा लिया है॥ २ ॥

चौ०

प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥ बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥३॥

भावार्थ

प्रातःकाल पवित्र ब्राह्ममुहूर्तमें प्रभु जागे। मुर्गे सुन्दर बोलने लगे। भाट और मागधोंने गुणोंका गान किया तथा नगरके लोग द्वारपर जोहार करनेको आये॥ ३ ॥

चौ०

बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥ जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥४॥

भावार्थ

ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओंने आदरके साथ उनके मुखोंको देखा। फिर वे राजाके साथ दरवाजे ( बाहर ) पधारे॥ ४ ॥

दो०

कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥३५८॥

भावार्थ

स्वभावसे ही पवित्र चारों भाइयोंने सब शौचादिसे निवृत्त होकर पवित्र सरयू नदीमें स्नान किया और प्रातःक्रिया ( सन्ध्या-वन्दनादि ) करके वे पिताके पास आये॥ ३५८ ॥

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