दोहा 356
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥ सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥१॥
भावार्थ
राजाके स्वभावसे ही सुन्दर वचन सुनकर [ रानियोंने ] मणियोंसे जड़े सुवर्णके पलँग बिछवाये। [ गद्दोंपर ] गौके दूधके फेनके समान सुन्दर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछायीं॥ १ ॥
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥ रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥२॥
भावार्थ
सुन्दर तकियोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियोंके मन्दिरमें फूलोंकी मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नोंके दीपकों और सुन्दर चँदोवेकी शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है॥ २ ॥
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥ अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥३॥
भावार्थ
इस प्रकार सुन्दर शय्या सजाकर [ माताओंने ] श्रीरामचन्द्रजीको उठाया और प्रेमसहित पलँगपर पौढ़ाया। श्रीरामजीने बार-बार भाइयोंको आज्ञा दी। तब वे भी अपनी-अपनी शय्याओंपर सो गये॥ ३ ॥
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥ मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥४॥
भावार्थ
श्रीरामजीके साँवले सुन्दर कोमल अङ्गोंको देखकर सब माताएँ प्रेमसहित वचन कह रही हैं—हे तात! मार्गमें जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसीको किस प्रकारसे मारा?॥ ४ ॥
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥३५६॥
भावार्थ
बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्धमें किसीको कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहुको सहायकोंसहित तुमने कैसे मारा?॥ ३५६ ॥
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