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दोहा 354

चौ०

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥ जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥१॥

भावार्थ

सब प्रकारसे सबका प्रेमपूर्वक भलीभाँति आदर-सत्कार कर लेनेपर राजा दशरथजीके हृदयमें पूर्ण उत्साह ( आनन्द ) भर गया। जहाँ रनिवास था, वे वहाँ पधारे और बहुओंसमेत उन्होंने कुमारोंको देखा॥ १ ॥

चौ०

लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥ बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥२॥

भावार्थ

राजाने आनन्दसहित पुत्रोंको गोदमें ले लिया। उस समय राजाको जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओंको प्रेमसहित गोदीमें बैठाकर, बार-बार हृदयमें हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार ( लाड़-चाव ) किया॥ २ ॥

चौ०

देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥ कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥३॥

भावार्थ

यह समाज ( समारोह ) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया। सबके हृदयमें आनन्दने निवास कर लिया। तब राजाने जिस तरह विवाह हुआ था वह सब कहा। उसे सुन-सुनकर सब किसीको हर्ष होता है॥ ३ ॥

चौ०

जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥ बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानी सब प्रमुदित सुनि करनी॥४॥

भावार्थ

राजा जनकके गुण, शील, महत्त्व, प्रीतिकी रीति और सुहावनी सम्पत्तिका वर्णन राजाने भाटकी तरह बहुत प्रकारसे किया। जनकजीकी करनी सुनकर सब रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं॥ ४ ॥

दो०

सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥३५४॥

भावार्थ

पुत्रोंसहित स्नान करके राजाने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियोंको बुलाकर अनेक प्रकारके भोजन किये। [ यह सब करते-करते ] पाँच घड़ी रात बीत गयी॥ ३५४ ॥

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