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दोहा 350b

चौ०

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥ तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥१॥

भावार्थ

स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेवने ही अपने हाथसे बनाये थे। उनपर माताओंने राजकुमारियों और राजकुमारोंको बैठाया और आदरके साथ उनके पवित्र चरण धोये॥ १ ॥

चौ०

धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि॥ बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥२॥

भावार्थ

फिर वेदकी विधिके अनुसार मङ्गलोंके निधान दूलह और दुलहिनोंकी धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा पूजा की। माताएँ बारंबार आरती कर रही हैं और वर-वधुओंके सिरोंपर सुन्दर पंखे तथा चँवर ढल रहे हैं॥ २ ॥

चौ०

बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥ पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं॥३॥

भावार्थ

अनेकों वस्तुएँ निछावर हो रही हैं; सभी माताएँ आनन्दसे भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगीने परम तत्त्वको प्राप्त कर लिया। सदाके रोगीने मानो अमृत पा लिया,॥ ३ ॥

चौ०

जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥ मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥४॥

भावार्थ

जन्मका दरिद्री मानो पारस पा गया। अंधेको सुन्दर नेत्रोंका लाभ हुआ। गूँगेके मुखमें मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीरने मानो युद्धमें विजय पा ली॥ ४ ॥

दो०

एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥३५० (क)॥

भावार्थ

इन सुखोंसे भी सौ करोड़ गुना बढ़कर आनन्द माताएँ पा रही हैं। क्योंकि रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयोंसहित घर आये हैं॥ ३५० ( क ) ॥

दो०

लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं॥३५० (ख)॥

भावार्थ

माताएँ लोकरीति करती हैं और दूलह-दुलहिनें सकुचाते हैं। इस महान्‌ आनन्द और विनोदको देखकर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ ३५० ( ख ) ॥

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