दोहा 348
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥ जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥१॥
भावार्थ
मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकोंके उजागर ( सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाशस्वरूप ) श्रीरामचन्द्रजीका यश गा रहे हैं। जयध्वनि तथा वेदकी निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मङ्गलसे सनी हुई दसों दिशाओंमें सुनायी पड़ रही है॥ १॥
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥ बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥२॥
भावार्थ
बहुत-से बाजे बजने लगे। आकाशमें देवता और नगरमें लोग सब प्रेममें मग्न हैं। बराती ऐसे बने-ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। परम आनन्दित हैं, सुख उनके मनमें समाता नहीं है॥ २॥
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥ करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥३॥
भावार्थ
तब अयोध्यावासियोंने राजाको जोहार ( वन्दना ) की। श्रीरामचन्द्रजीको देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियाँ और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं॥ ३॥
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी॥ सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥४॥
भावार्थ
नगरकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर आरती कर रही हैं और सुन्दर चारों कुमारोंको देखकर हर्षित हो रही हैं। पालकियोंके सुन्दर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनोंको देखकर सुखी होती हैं॥ ४॥
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥३४८॥
भावार्थ
इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वारपर आये। माताएँ आनन्दित होकर बहुओंसहित कुमारोंका परछन कर रही हैं॥ ३४८॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें