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दोहा 331

चौ०

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥ चारि लच्छ बर धेनु मगाईं। काम सुरभि सम सील सुहाईं॥१॥

भावार्थ

राजाने सबको दण्डवत्‌ प्रणाम किया और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिये। चार लाख उत्तम गायें मँगवायीं, जो कामधेनुके समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं॥ १॥

चौ०

सब बिधि सकल अलंकृत कीन्ही। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्ही॥ करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जगजीवन लाहू॥२॥

भावार्थ

उन सबको सब प्रकारसे [ गहनों-कपड़ोंसे ] सजाकर राजाने प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणोंको दिया। राजा बहुत तरहसे विनती कर रहे हैं कि जगत्‌में मैंने आज ही जीनेका लाभ पाया॥ २॥

चौ०

पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥ कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥३॥

भावार्थ

[ ब्राह्मणोंसे ] आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकोंके समूहोंको बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ ( जिसने जो चाहा सो ) सूर्यकुलको आनन्दित करनेवाले दशरथजीने दिये॥ ३॥

चौ०

चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥ एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥४॥

भावार्थ

वे सब गुणानुवाद गाते और ‘सूर्यकुलके स्वामीकी जय हो, जय हो, जय हो’ कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते॥ ४॥

दो०

बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥३३१॥

भावार्थ

बार-बार विश्वामित्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर राजा कहते हैं—हे मुनिराज! यह सब सुख आपके ही कृपाकटाक्षका प्रसाद है॥ ३३१॥

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