दोहा 329
पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥ भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥ १ ॥
भावार्थ
सब लोग पंचकौर करके ( अर्थात् ‘प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा’ इन मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर ) भोजन करने लगे। गालीका गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गये। अनेकों तरहके अमृतके समान ( स्वादिष्ट ) पकवान परसे गये, जिनका बखान नहीं हो सकता॥ १॥
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥ चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥ २ ॥
भावार्थ
चतुर रसोइये नाना प्रकारके व्यञ्जन परसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकारके ( चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात् चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खानेयोग्य ) भोजनकी विधि कही गयी है, उनमेंसे एक-एक विधिके इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ २॥
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥ जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥ ३ ॥
भावार्थ
छहों रसोंके बहुत तरहके सुन्दर ( स्वादिष्ट ) व्यञ्जन हैं। एक-एक रसके अनगिनती प्रकारके बने हैं। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियोंके नाम ले-लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनिसे गाली दे रही हैं ( गाली गा रही हैं )॥ ३॥
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥ एहि बिधि सबहीं भोजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥ ४ ॥
भावार्थ
समयकी सुहावनी गाली शोभित हो रही है। उसे सुनकर समाजसहित राजा दशरथजी हँस रहे हैं। इस रीतिसे सभीने भोजन किया और तब सबको आदरसहित आचमन ( हाथ-मुँह धोनेके लिये जल ) दिया गया॥ ४॥
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥ ३२९ ॥
भावार्थ
फिर पान देकर जनकजीने समाजसहित दशरथजीका पूजन किया। सब राजाओंके सिरमौर ( चक्रवर्ती ) श्रीदशरथजी प्रसन्न होकर जनवासेको चले॥ ३२९॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें