दोहा 327
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥ जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका साँवला शरीर स्वभावसे ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाली है। महावरसे युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिनपर मुनियोंके मनरूपी भौंरे सदा छाये रहते हैं॥१॥
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥ कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥ २ ॥
भावार्थ
पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकालके सूर्य और बिजलीकी ज्योतिको हरे लेती है। कमरमें सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओंमें सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं॥२॥
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥ सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे॥ ३ ॥
भावार्थ
पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथकी अँगूठी चित्तको चुरा लेती है। ब्याहके सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छातीपर हृदयपर पहननेके सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं॥३॥
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥ नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥ ४ ॥
भावार्थ
पीला दुपट्टा काँखासोती ( जनेऊकी तरह ) शोभित है, जिसके दोनों छोरोंपर मणि और मोती लगे हैं। कमलके समान सुन्दर नेत्र हैं, कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरताका खजाना ही है॥४॥
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥ सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥ ५ ॥
भावार्थ
सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाटपर तिलक तो सुन्दरताका घर ही है। जिसमें मङ्गलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माथेपर सोह रहा है॥५॥
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥ मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥ १ ॥
भावार्थ
सुन्दर मौरमें बहुमूल्य मणियाँ गुँथी हुई हैं, सभी अङ्ग चित्तको चुराये लेते हैं। सब नगरकी स्त्रियाँ और देवसुन्दरियाँ दूलहको देखकर तिनका तोड़ रही हैं ( उनकी बलैयाँ ले रही हैं ) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण निछावर करके आरती उतार रही और मङ्गलगान कर रही हैं। देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं॥१॥
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥ लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥ २ ॥
भावार्थ
सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियोंको कोहबर ( कुलदेवताके स्थान ) में लायीं और अत्यन्त प्रेमसे मङ्गलगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। पार्वतीजी श्रीरामचन्द्रजीको लहकौर ( वर-वधूका परस्पर ग्रास देना ) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजीको सिखाती हैं। रनिवास हास-विलासके आनन्दमें मग्न है, [ श्रीरामजी और सीताजीको देख-देखकर ] सभी जन्मका परम फल प्राप्त कर रही हैं॥ २॥
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥ कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥ ३ ॥
भावार्थ
अपने हाथकी मणियोंमें सुन्दर रूपके भण्डार श्रीरामचन्द्रजीकी परछाहीं दीख रही है। यह देखकर जानकीजी दर्शनमें वियोग होनेके भयसे बाहुरूपी लताको और दृष्टिको हिलाती-डुलाती नहीं हैं। उस समयके हँसी-खेल और विनोदका आनन्द और प्रेम कहा नहीं जा सकता, उसे सखियाँ ही जानती हैं। तदनन्तर वर-कन्याओंको सब सुन्दर सखियाँ जनवासेको लिवा चलीं॥ ३॥
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्यो मुदित मन सबहीं कहा॥ जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥ ४ ॥
भावार्थ
उस समय नगर और आकाशमें जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वादकी ध्वनि सुनायी दे रही है और महान् आनन्द छाया है। सभीने प्रसन्न मनसे कहा कि सुन्दर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगिराज, सिद्ध, मुनीश्वर और देवताओंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलोंकी वर्षा करते हुए तथा ‘जय हो, जय हो,जय हो’ कहते हुए वे अपने-अपने लोकको चले॥ ४॥
सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥ ३२७ ॥
भावार्थ
तब सब ( चारों ) कुमार बहुओंसहित पिताजीके पास आये। ऐसा मालूम होता था मानो शोभा, मङ्गल और आनन्दसे भरकर जनवासा उमड़ पड़ा हो॥ ३२७॥
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