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दोहा 325

चौ०

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥ जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥ १ ॥

भावार्थ

वर और कन्या सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक [ उन्हें देखकर ] नेत्रोंका परम लाभ ले रहे हैं। मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूँ वही थोड़ी होगी॥१॥

चौ०

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥ मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥ २ ॥

भावार्थ

श्रीरामजी और श्रीसीताजीकी सुन्दर परछाहीं मणियोंके खम्भोंमें जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत-से रूप धारण करके श्रीरामजीके अनुपम विवाहको देख रहे हैं॥२॥

चौ०

दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥ भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥ ३ ॥

भावार्थ

उन्हें ( कामदेव और रतिको ) दर्शनकी लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं ( अर्थात् बहुत हैं ); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजीकी भाँति सभी अपनी सुध भूल गये॥३॥

चौ०

प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥ राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥ ४ ॥

भावार्थ

मुनियोंने आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरायीं और नेगसहित सब रीतियोंको पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके सिरमें सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती॥४॥

चौ०

अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥ बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥ ५ ॥

भावार्थ

मानो कमलको लाल परागसे अच्छी तरह भरकर अमृतके लोभसे साँप चन्द्रमाको भूषित कर रहा है। [ यहाँ श्रीरामके हाथको कमलकी, सेंदुरको परागकी, श्रीरामकी श्याम भुजाको साँपकी और सीताजीके मुखको चन्द्रमाकी उपमा दी गयी है ] फिर वसिष्ठजीने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसनपर बैठे॥५॥

छं०

बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसनपर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मनमें बहुत आनन्दित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्षमें नये फल [ आये ] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनोंमें उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजीका विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मङ्गल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!॥१॥

छं०

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥ २ ॥

भावार्थ

तब वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर जनकजीने विवाहका सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी—इन तीनों राजकुमारियोंको बुला लिया। कुशध्वजकी बड़ी कन्या माण्डवीजीको, जो गुण, शील, सुख और शोभाकी रूप ही थीं, राजा जनकने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजीको ब्याह दिया॥२॥

छं०

जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥ जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥ ३ ॥

भावार्थ

जानकीजीकी छोटी बहिन उर्मिलाजीको सब सुन्दरियोंमें शिरोमणि जानकर उस कन्याको सब प्रकारसे सम्मान करके, लक्ष्मणजीको ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुन्दर नेत्रोंवाली, सुन्दर मुखवाली, सब गुणोंकी खान और रूप तथा शीलमें उजागर हैं, उनको राजाने शत्रुघ्नको ब्याह दिया॥ ३ ॥

छं०

अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥ ४ ॥

भावार्थ

दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ीको देखकर सकुचते हुए हृदयमें हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरताकी सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्होंके साथ एक ही मण्डपमें ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीवके हृदयमें चारों अवस्थाएँ ( जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ) अपने चारों स्वामियों ( विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म ) सहित विराजमान हों॥ ४॥

दो०

मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ ३२५ ॥

भावार्थ

सब पुत्रोंको बहुओंसहित देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं, मानो वे राजाओंके शिरोमणि क्रियाओं ( यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया ) सहित चारों फल ( अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ) पा गये हों॥ ३२५॥

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