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दोहा 321

चौ०

बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥ कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥१॥

भावार्थ

फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजीकी पूजा उन्हें ईश ( महादेवजी ) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था। तदनन्तर [ उनके सम्बन्धसे ] अपने भाग्य और वैभवके विस्तारकी सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की॥ १ ॥

चौ०

पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती॥ आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥२॥

भावार्थ

राजा जनकजीने सब बरातियोंका समधी दशरथजीके समान ही सब प्रकारसे आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसीको उचित आसन दिये। मैं एक मुखसे उस उत्साहका क्या वर्णन करूँ॥ २ ॥

चौ०

सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥ बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥३॥

भावार्थ

राजा जनकने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणीसे सारी बारातका सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुनाथजीका प्रभाव जानते हैं,॥ ३ ॥

चौ०

कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥ पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥४॥

भावार्थ

वे कपटसे ब्राह्मणोंका सुन्दर वेष बनाये बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे। जनकजीने उनको देवताओंके समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुन्दर आसन दिये॥ ४॥

छं०

पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥ सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥

भावार्थ

कौन किसको जाने-पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है। आनन्दकन्द दूलहको देखकर दोनों ओर आनन्दमयी स्थिति हो रही है। सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये। प्रभुका शील-स्वभाव देखकर देवगण मनमें बहुत आनन्दित हुए।

दो०

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥३२१॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी छबिको सभीके सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनन्द कम नहीं है ( अर्थात् बहुत है )॥ ३२१ ॥

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