दोहा 318
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥ पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥१॥
भावार्थ
सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी ( चन्द्रमाके समान मुखवाली ) और सभी मृगलोचनी ( हरिणकी-सी आँखोंवाली ) हैं और सभी अपने शरीरकी शोभासे रतिके गर्वको छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंगकी सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीरपर सब आभूषण सजे हुए हैं॥१॥
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥ कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥२॥
भावार्थ
समस्त अङ्गोंको सुन्दर मङ्गल पदार्थोंसे सजाये हुए वे कोयलको भी लजाती हुई [ मधुर स्वरसे ] गान कर रही हैं। कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियोंकी चाल देखकर कामदेवके हाथी भी लजा जाते हैं॥२॥
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥ सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥३॥
भावार्थ
अनेक प्रकारके बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानोंमें सुन्दर मङ्गलाचार हो रहे हैं। शची ( इन्द्राणी ), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभावसे ही पवित्र और सयानी देवाङ्गनाएँ थीं,॥३॥
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई॥ करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानीं॥४॥
भावार्थ
वे सब कपटसे सुन्दर स्त्रीका वेष बनाकर रनिवासमें जा मिलीं और मनोहर वाणीसे मङ्गलगान करने लगीं। सब कोई हर्षके विशेष वश थे, अतः किसीने उन्हें पहचाना नहीं॥४॥
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
भावार्थ
कौन किसे जाने-पहिचाने! आनन्दके वश हुई सब दूलह बने हुए ब्रह्मका परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर-मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलहको देखकर सब स्त्रियाँ हृदयमें हर्षित हुईं। उनके कमल-सरीखे नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल उमड़ आया और सुन्दर अङ्गोंमें पुलकावली छा गयी।
जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥३१८॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका वरवेष देखकर सीताजीकी माता सुनयनाजीके मनमें जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पोंमें भी नहीं कह सकते [ अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पोंमें भी नहीं कह सकते ]॥३१८॥
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