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दोहा 29c

चौ०

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥ समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥१॥

भावार्थ

यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पापको सुनकर नरकने भी नाक सिकोड़ ली है ( अर्थात् नरकमें भी मेरे लिये ठौर नहीं है )। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डरसे डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने तो स्वप्नमें भी इसपर ( मेरी इस ढिठाई और दोषपर ) ध्यान नहीं दिया॥ १ ॥

चौ०

सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥ कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥२॥

भावार्थ

वरं मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने तो इस बातको सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षुसे निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धिकी [ उलटे ] सराहना की। क्योंकि कहनेमें चाहे बिगड़ जाय ( अर्थात् मैं चाहे अपनेको भगवान्‌का सेवक कहता-कहलाता रहूँ ), परंतु हृदयमें अच्छापन होना चाहिये। ( हृदयमें तो अपनेको उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दासके हृदयकी [ अच्छी ] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं॥ २॥

चौ०

रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥३॥

भावार्थ

प्रभुके चित्तमें अपने भक्तोंकी की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती ( वे उसे भूल जाते हैं ) और उनके हृदय [ की अच्छाई—नीकी ] को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं। जिस पापके कारण उन्होंने बालिको व्याधकी तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीवने चली॥ ३ ॥

चौ०

सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥ ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥४॥

भावार्थ

वही करनी विभीषणकी थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजीने स्वप्नमें भी उसका मनमें विचार नहीं किया। उलटे भरतजीसे मिलनेके समय श्रीरघुनाथजीने उनका सम्मान किया और राजसभामें भी उनके गुणोंका बखान किया॥ ४॥

दो०

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान॥२९(क)॥

भावार्थ

प्रभु ( श्रीरामचन्द्रजी ) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर ( अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर)। परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं॥ २९ ( क )॥

दो०

राम निकाईं रावरी है सबही को नीक। जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥२९(ख)॥

भावार्थ

हे श्रीरामजी! आपकी अच्छाईसे सभीका भला है ( अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है )। यदि यह बात सच है तो तुलसीदासका भी सदा कल्याण ही होगा॥ २९ ( ख )॥

दो०

एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ। बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥२९(ग)॥

भावार्थ

इस प्रकार अपने गुण-दोषोंको कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन करता हूँ जिसके सुननेसे कलियुगके पाप नष्ट हो जाते हैं॥२९ (ग)॥

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