दोहा 293
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥ देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥१॥
भावार्थ
धनुष टूटनेकी बात सुनकर परशुरामजी क्रोधभरे आये और उन्होंने बहुत प्रकारसे आँखें दिखलायीं। अन्तमें उन्होंने भी श्रीरामचन्द्रजीका बल देखकर उन्हें अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकारसे विनती करके वनको गमन किया॥१॥
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥ कंपहिं भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥२॥
भावार्थ
हे राजन्! जैसे श्रीरामचन्द्रजी अतुलनीय बली हैं, वैसे ही तेजनिधान फिर लक्ष्मणजी भी हैं, जिनके देखनेमात्रसे राजालोग ऐसे काँप उठते थे, जैसे हाथी सिंहके बच्चेके ताकनेसे काँप उठते हैं॥२॥
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥ दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥३॥
भावार्थ
हे देव! आपके दोनों बालकोंको देखनेके बाद अब आँखोंके नीचे कोई आता ही नहीं ( हमारी दृष्टिपर कोई चढ़ता ही नहीं )। प्रेम, प्रताप और वीर-रसमें पगी हुई दूतोंकी वचनरचना सबको बहुत प्रिय लगी॥३॥
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥ कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना॥४॥
भावार्थ
सभासहित राजा प्रेममें मग्न हो गये और दूतोंको निछावर देने लगे। [ उन्हें निछावर देते देखकर ] यह नीतिविरुद्ध है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथोंसे कान मूँदने लगे। धर्मको विचारकर ( उनका धर्मयुक्त बर्ताव देखकर ) सभीने सुख माना॥४॥
तब उठि भूप बसिष्ट कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ। कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ॥२९३॥
भावार्थ
तब राजाने उठकर वसिष्ठजीके पास जाकर उन्हें पत्रिका दी और आदरपूर्वक दूतोंको बुलाकर सारी कथा गुरुजीको सुना दी॥२९३॥
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