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दोहा 281

चौ०

बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥ करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥१॥

भावार्थ

तेरा यह भाई तेरी ही सम्मतिसे कटु वचन बोलता है और तू छलसे हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्धमें मेरा सन्तोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे॥ १ ॥

चौ०

छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥ भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ॥२॥

भावार्थ

अरे शिवद्रोही! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बक रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ २ ॥

चौ०

गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥३॥

भावार्थ

[ श्रीरामचन्द्रजीने मन-ही-मन कहा— ] गुनाह ( दोष ) तो लक्ष्मणका और क्रोध मुझपर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपनमें भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसीकी भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमाको राहु भी नहीं ग्रसता॥ ३ ॥

चौ०

राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥ जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी॥४॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीने [ प्रकट ] कहा—हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िये। आपके हाथमें कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी! वही कीजिये। मुझे अपना अनुचर ( दास ) जानिये॥ ४ ॥

दो०

प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥२८१॥

भावार्थ

स्वामी और सेवकमें युद्ध कैसा ? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! क्रोधका त्याग कीजिये। आपका [ वीरोंका-सा ] वेष देखकर ही बालकने कुछ कह डाला था; वास्तवमें उसका भी कोई दोष नहीं है॥ २८१ ॥

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