दोहा 268
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं । सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं ॥ तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥ १ ॥
भावार्थ
खलबली देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं और सब मिलकर राजाओंको गालियाँ देने लगीं। उसी मौकेपर शिवजीके धनुषका टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमलके सूर्य परशुरामजी आये॥ १ ॥
देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥ गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥ २ ॥
भावार्थ
इन्हें देखकर सब राजा सकुचा गये, मानो बाजके झपटनेपर बटेर लुक ( छिप ) गये हों। गोरे शरीरपर विभूति ( भस्म ) बड़ी फब रही है और विशाल ललाटपर त्रिपुण्ड्र विशेष शोभा दे रहा है॥ २ ॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिसबस कछुक अरुन होइ आवा ॥ भृकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥ ३ ॥
भावार्थ
सिरपर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोधके कारण कुछ लाल हो आया है। भौंहें टेढ़ी और आँखें क्रोधसे लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं॥ ३ ॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनेउ माल मृगछाला ॥ कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥ ४ ॥
भावार्थ
बैलके समान ( ऊँचे और पुष्ट ) कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमरमें मुनियोंका वस्त्र ( वल्कल ) और दो तरकस बाँधे हैं। हाथमें धनुष-बाण और सुन्दर कंधेपर फरसा धारण किये हैं॥ ४ ॥
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप । धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप ॥ २६८ ॥
भावार्थ
शान्त वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर है; स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर-रस ही मुनिका शरीर धारण करके, जहाँ सब राजालोग हैं वहाँ आ गया हो॥ २६८ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें