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दोहा 266

चौ०

तब सिय देखि भूप अभिलाषे । कूर कपूत मूढ़ मन माखे ॥ उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ॥ १ ॥

भावार्थ

उस समय सीताजीको देखकर कुछ राजा लोग ललचा उठे। वे दुष्ट, कुपूत और मूढ़ राजा मनमें बहुत तमतमाये। वे अभागे उठ-उठकर, कवच पहनकर, जहाँ-तहाँ गाल बजाने लगे॥ १ ॥

चौ०

लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ । धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ ॥ तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई । जीवत हमहि कुअँरि को बरई ॥ २ ॥

भावार्थ

कोई कहते हैं, सीताको छीन लो और दोनों राजकुमारोंको पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़नेसे ही चाह नहीं सरेगी ( पूरी होगी )। हमारे जीते-जी राजकुमारीको कौन ब्याह सकता है?॥ २ ॥

चौ०

जौं बिदेहु कछु करै सहाई । जीतहु समर सहित दोउ भाई ॥ साधु भूप बोले सुनि बानी । राजसमाजहि लाज लजानी ॥ ३ ॥

भावार्थ

यदि जनक कुछ सहायता करे, तो युद्धमें दोनों भाइयोंसहित उसे भी जीत लो। ये वचन सुनकर साधु राजा बोले—इस [ निर्लज्ज ] राजसमाजको देखकर तो लाज भी लजा गयी॥ ३ ॥

चौ०

बलु प्रतापु बीरता बड़ाई । नाक पिनाकहि संग सिधाई ॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई । असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई ॥ ४ ॥

भावार्थ

अरे ! तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और नाक ( प्रतिष्ठा ) तो धनुषके साथ ही चली गयी। वही वीरता थी कि अब कहींसे मिली है? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाताने तुम्हारे मुखोंपर कालिख लगा दी॥ ४ ॥

दो०

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु । लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु ॥ २६६ ॥

भावार्थ

ईर्ष्या, घमंड और क्रोध छोड़कर नेत्र भरकर श्रीरामजी [ की छबि ] को देख लो। लक्ष्मणके क्रोधको प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे मत बनो॥ २६६ ॥

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