दोहा 247
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥१॥
भावार्थ
रूप और गुणोंकी खान जगज्जननी जानकीजीकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिये मुझे [ काव्यकी ] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियोंके अंगोंसे अनुराग रखनेवाली हैं ( अर्थात् वे जगत्की स्त्रियोंके अंगोंको दी जाती हैं )। [ काव्यकी उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजीके अप्राकृत, चिन्मय अंगोंके लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपनेको उपहासास्पद बनाना है ]॥ १ ॥
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई॥ जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया॥२॥
भावार्थ
सीताजीके वर्णनमें उन्हीं उपमाओंको देकर कौन कुकवि कहलाये और अपयशका भागी बने ( अर्थात् सीताजीके लिये उन उपमाओंका प्रयोग करना सुकविके पदसे च्युत होना और अपकीर्ति मोल लेना है, कोई भी सुकवि ऐसी नादानी एवं अनुचित कार्य नहीं करेगा।) यदि किसी स्त्रीके साथ सीताजीकी तुलना की जाय तो जगत्में ऐसी सुन्दर युवती है ही कहाँ [ जिसकी उपमा उन्हें दी जाय ]॥ २ ॥
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥ बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥३॥
भावार्थ
[ पृथ्वीकी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या, देवताओंकी स्त्रियोंको भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें ] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं ( अर्थात् अर्द्ध-नारीनटेश्वरके रूपमें उनका आधा ही अंग स्त्रीका है, शेष आधा अंग पुरुष—शिवजीका है ), कामदेवकी स्त्री रति पतिको बिना शरीरका ( अनंग ) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और मद्य-जैसे [ समुद्रसे उत्पन्न होनेके नाते ] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मीके समान तो जानकीजीको कहा ही कैसे जाय॥ ३ ॥
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छपु सोई॥ सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू॥४॥
भावार्थ
[ जिन लक्ष्मीजीकी बात ऊपर कही गयी है वे निकली थीं खारे समुद्रसे, जिसको मथनेके लिये भगवान्ने अति कर्कश पीठवाले कच्छपका रूप धारण किया, रस्सी बनायी गयी महान् विषधर वासुकि नागकी, मथानीका कार्य किया अतिशय कठोर मन्दराचल पर्वतने और उसे मथा सारे देवताओं और दैत्योंने मिलकर। जिन लक्ष्मीको अतिशय शोभाकी खान और अनुपम सुन्दरी कहते हैं, उनको प्रकट करनेमें हेतु बने ये सब असुन्दर एवं स्वाभाविक ही कठोर उपकरण। ऐसे उपकरणोंसे प्रकट हुई लक्ष्मी श्रीजानकीजीकी समताको कैसे पा सकती हैं। हाँ, इसके विपरीत ] यदि छबिरूपी अमृतका समुद्र हो, परम रूपमय कच्छप हो, शोभारूप रस्सी हो, शृंगार [ रस ] पर्वत हो और [ उस छबिके समुद्रको ] स्वयं कामदेव अपने ही करकमलसे मथे,॥ ४ ॥
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल॥२४७॥
भावार्थ
इस प्रकार ( का संयोग होनेसे ) जब सुन्दरता और सुखकी मूल लक्ष्मी उत्पन्न हो, तो भी कवि लोग उसे ( बहुत ) संकोचके साथ सीताजीके समान कहेंगे॥ २४७ ॥ [ जिस सुन्दरताके समुद्रको कामदेव मथेगा वह सुन्दरता भी प्राकृत, लौकिक सुन्दरता ही होगी; क्योंकि कामदेव स्वयं भी त्रिगुणमयी प्रकृतिका ही विकार है। अतः उस सुन्दरताको मथकर प्रकट की हुई लक्ष्मी भी उपर्युक्त लक्ष्मीकी अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर और दिव्य होनेपर भी होगी प्राकृत ही, अतः उसके साथ भी जानकीजीकी तुलना करना कविके लिये बड़े संकोचकी बात होगी। जिस सुन्दरतासे जानकीजीका दिव्यातिदिव्य परम दिव्य विग्रह बना है वह सुन्दरता उपर्युक्त सुन्दरतासे भिन्न अप्राकृत है—वस्तुतः लक्ष्मीजीका अप्राकृत रूप भी यही है। वह कामदेवके मथनेमें नहीं आ सकती और वह जानकीजीका स्वरूप ही है, अतः उनसे भिन्न नहीं, और उपमा दी जाती है भिन्न वस्तुके साथ। इसके अतिरिक्त जानकीजी प्रकट हुई हैं स्वयं अपनी महिमासे, उन्हें प्रकट करनेके लिये किसी भिन्न उपकरणकी अपेक्षा नहीं है। अर्थात् शक्ति शक्तिमान्से अभिन्न, अद्वैत-तत्त्व है, अतएव अनुपमेय है, यही गूढ़ दार्शनिक तत्त्व भक्तशिरोमणि कविने इस अभूतोपमालङ्कारके द्वारा बड़ी सुन्दरतासे व्यक्त किया है। ]
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