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दोहा 239

चौ०

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥ कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥१॥

भावार्थ

सब राजारूपी तारे उजाला ( मन्द प्रकाश ) करते हैं, पर वे धनुषरूपी महान्‌ अन्धकारको हटा नहीं सकते। रात्रिका अन्त होनेसे जैसे कमल, चकवे, भौंरे और नाना प्रकारके पक्षी हर्षित हो रहे हैं॥१॥

चौ०

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥ उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥२॥

भावार्थ

वैसे ही हे प्रभो! आपके सब भक्त धनुष टूटनेपर सुखी होंगे। सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया। तारे छिप गये, संसारमें तेजका प्रकाश हो गया॥२॥

चौ०

रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥ तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥३॥

भावार्थ

हे रघुनाथजी! सूर्यने अपने उदयके बहाने सब राजाओंको प्रभु ( आप ) का प्रताप दिखलाया है। आपकी भुजाओंके बलकी महिमाको उद्‌घाटित करने ( खोलकर दिखाने ) के लिये ही धनुष तोड़नेकी यह पद्धति प्रकट हुई है॥३॥

चौ०

बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥ नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥४॥

भावार्थ

भाईके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर स्वभावसे ही पवित्र श्रीरामजीने शौचसे निवृत्त होकर स्नान किया और नित्यकर्म करके वे गुरुजीके पास आये। आकर उन्होंने गुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें सिर नवाया॥४॥

चौ०

सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥ जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥५॥

भावार्थ

तब जनकजीने शतानन्दजीको बुलाया और उन्हें तुरंत ही विश्वामित्र मुनिके पास भेजा। उन्होंने आकर जनकजीकी विनती सुनायी। विश्वामित्रजीने हर्षित होकर दोनों भाइयोंको बुलाया॥५॥

दो०

सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥२३९॥

भावार्थ

शतानन्दजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गुरुजीके पास जा बैठे। तब मुनिने कहा—हे तात! चलो, जनकजीने बुला भेजा है॥२३९॥

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