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दोहा 234

श्रीसीताजीका पार्वती-पूजन एवं वरदानप्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण-संवाद

चौ०

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥ बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥१॥

भावार्थ

एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजीसे बोली— गिरिजाजीका ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमारको क्यों नहीं देख लेतीं॥१॥

चौ०

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥ नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥२॥

भावार्थ

तब सीताजीने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुलके दोनों सिंहोंको अपने सामने [ खड़े ] देखा। नखसे शिखातक श्रीरामजीकी शोभा देखकर और फिर पिताका प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया॥२॥

चौ०

परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥ पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥३॥

भावार्थ

जब सखियोंने सीताजीको परवश ( प्रेमके वश ) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं—बड़ी देर हो गयी [ अब चलना चाहिये ]। कल इसी समय फिर आयेंगी, ऐसा कहकर एक सखी मनमें हँसी॥३॥

चौ०

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥ धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥४॥

भावार्थ

सखीकी यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं। देर हो गयी जान उन्हें माताका भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें ले आयीं, और [ उनका ध्यान करती हुई ] अपनेको पिताके अधीन जानकर लौट चलीं॥४॥

दो०

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥२३४॥

भावार्थ

मृग, पक्षी और वृक्षोंको देखनेके बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्रीरामजीकी छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है ( अर्थात्‌ बहुत ही बढ़ता जाता है )॥२३४॥

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