दोहा 232
चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥ जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥१॥
भावार्थ
सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बातकी चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गये। बालमृग-नयनी ( मृगके छौनेकी-सी आँखवाली ) सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलोंकी कतार बरस जाती है॥१॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥ देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥२॥
भावार्थ
तब सखियोंने लताकी ओटमें सुन्दर श्याम और गौर कुमारोंको दिखलाया। उनके रूपको देखकर नेत्र ललचा उठे; वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया॥२॥
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥ अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥३॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी छबि देखकर नेत्र थकित ( निश्चल ) हो गये। पलकोंने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेहके कारण शरीर विह्वल ( बेकाबू ) हो गया। मानो शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको चकोरी [ बेसुध हुई ] देख रही हो॥३॥
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥ जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥४॥
भावार्थ
नेत्रोंके रास्ते श्रीरामजीको हृदयमें लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजीने पलकोंके किवाड़ लगा दिये ( अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं )। जब सखियोंने सीताजीको प्रेमके वश जाना, तब वे मनमें सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं॥४॥
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ। निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ॥२३२॥
भावार्थ
उसी समय दोनों भाई लतामण्डप ( कुञ्ज ) मेंसे प्रकट हुए। मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलोंके पर्देको हटाकर निकले हों॥२३२॥
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