दोहा 228
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥ तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥१॥
भावार्थ
चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियोंसे पूछकर वे प्रसन्न मनसे पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आयीं। माताने उन्हें गिरिजा ( पार्वती ) जीकी पूजा करनेके लिये भेजा था॥१॥
संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥ सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥२॥
भावार्थ
साथमें सब सुन्दरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणीसे गीत गा रही हैं। सरोवरके पास गिरिजाजीका मन्दिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; देखकर मन मोहित हो जाता है॥२॥
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥ पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥३॥
भावार्थ
सखियोंसहित सरोवरमें स्नान करके सीताजी प्रसन्न मनसे गिरिजाजीके मन्दिरमें गयीं। उन्होंने बड़े प्रेमसे पूजा की और अपने योग्य सुन्दर वर माँगा॥३॥
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥ तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥४॥
भावार्थ
एक सखी सीताजीका साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गयी थी। उसने जाकर दोनों भाइयोंको देखा और प्रेममें विह्वल होकर वह सीताजीके पास आयी॥४॥
तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन। कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन॥२२८॥
भावार्थ
सखियोंने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रोंमें जल भरा है। सब कोमल वाणीसे पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नताका कारण बता॥२२८॥
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