दोहा 225
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥ निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥ १॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने सब बालकोंको प्रेमके वश जानकर [ यज्ञभूमिके ] स्थानोंकी प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। [ इससे बालकोंका उत्साह, आनन्द और प्रेम और भी बढ़ गया, जिससे ] वे सब अपनी-अपनी रुचिके अनुसार उन्हें बुला लेते हैं और [ प्रत्येकके बुलानेपर ] दोनों भाई प्रेमसहित उनके पास चले जाते हैं॥१॥
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥ लव निमेष महुँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥२॥
भावार्थ
कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणको [ यज्ञभूमिकी ] रचना दिखलाते हैं। जिनकी आज्ञा पाकर माया लव निमेष ( पलक गिरनेके चौथाई समय ) में ब्रह्माण्डोंके समूह रच डालती है,॥२॥
भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥ कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥ ३॥
भावार्थ
वही दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरामजी भक्तिके कारण धनुषयज्ञशालाको चकित होकर ( आश्चर्यके साथ ) देख रहे हैं। इस प्रकार सब कौतुक ( विचित्र रचना ) देखकर वे गुरुके पास चले। देर हुई जानकर उनके मनमें डर है॥३॥
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥ कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआईं॥४॥
भावार्थ
जिनके भयसे डरको भी डर लगता है, वही प्रभु भजनका प्रभाव [ जिसके कारण ऐसे महान् प्रभु भी भयका नाट्य करते हैं ] दिखला रहे हैं। उन्होंने कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहकर बालकोंको जबर्दस्ती विदा किया॥४॥
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥२२५॥
भावार्थ
फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोचके साथ दोनों भाई गुरुके चरणकमलोंमें सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे॥२२५॥
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