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दोहा 219

चौ०

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥ बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥१॥

भावार्थ

सब लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाले दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करके चले। बालकोंके झुंड इन [ के सौन्दर्य ] की अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गये। उनके नेत्र और मन [ इनकी माधुरीपर ] लुभा गये॥१॥

चौ०

पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥ तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥२॥

भावार्थ

[ दोनों भाइयोंके ] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [ पीले ] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं। हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित हैं। [ श्याम और गौर वर्णके ] शरीरोंके अनुकूल ( अर्थात्‌ जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके ) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है। साँवरे और गोरे [ रंग ] की मनोहर जोड़ी है॥२॥

चौ०

केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥ सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥३॥

भावार्थ

सिंहके समान ( पुष्ट ) गर्दन ( गलेका पिछला भाग ) है; विशाल भुजाएँ हैं। [ चौड़ी ] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुक्ताकी माला है। सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं। तीनों तापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है॥३॥

चौ०

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥ चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥४॥

भावार्थ

कानोंमें सोनेके कर्णफूल [ अत्यन्त ] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [ देखनेवालेके ] चित्तको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन ( दृष्टि ) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [ माथेपर ] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [ मूर्तिमती ] शोभापर मुहर लगा दी गयी है॥४॥

दो०

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥२१९॥

भावार्थ

सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [ दिये ] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक ( एड़ीसे चोटीतक ) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है॥२१९॥

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