दोहा 201
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥ निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥१॥
भावार्थ
एक बार माताने श्रीरामचन्द्रजीको स्नान कराया और शृंगार करके पालनेपर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुलके इष्टदेव भगवान्की पूजाके लिये स्नान किया॥१॥
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥ बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥२॥
भावार्थ
पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गयी, जहाँ रसोई बनायी गयी थी। फिर माता वहीं (पूजाके स्थानमें) लौट आयी, और वहाँ आनेपर पुत्रको [इष्टदेव भगवान्के लिये चढ़ाये हुए नैवेद्यका] भोजन करते देखा॥२॥
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥ बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥३॥
भावार्थ
माता भयभीत होकर (पालनेमें सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बातसे डरकर) पुत्रके पास गयी, तो वहाँ बालकको सोया हुआ देखा। फिर [पूजास्थानमें लौटकर] देखा कि वही पुत्र वहाँ [भोजन कर रहा] है। उनके हृदयमें कम्प होने लगा और मनको धीरज नहीं होता॥३॥
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥ देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥४॥
भावार्थ
[वह सोचने लगी कि] यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धिका भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने माताको घबड़ायी हुई देखकर मधुर मुसकानसे हँस दिया॥४॥
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥२०१॥
भावार्थ
फिर उन्होंने माताको अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं॥२०१॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें