दोहा 197
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥ नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥१॥
भावार्थ
इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण-संस्कारका समय जानकर राजाने ज्ञानी मुनि श्रीवसिष्ठजीको बुला भेजा॥१॥
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥ इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥२॥
भावार्थ
मुनिकी पूजा करके राजाने कहा—हे मुनि! आपने मनमें जो विचार रखे हों, वे नाम रखिये। [मुनिने कहा—] हे राजन्! इनके अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कहूँगा॥२॥
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥ सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥३॥
भावार्थ
ये जो आनन्दके समुद्र और सुखकी राशि हैं, जिस (आनन्दसिन्धु) के एक कणसे तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम ‘राम’ है, जो सुखका भवन और सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति देनेवाला है॥३॥
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥४॥
भावार्थ
जो संसारका भरण-पोषण करते हैं, उन (आपके दूसरे पुत्र) का नाम ‘भरत’ होगा। जिनके स्मरणमात्रसे शत्रुका नाश होता है, उनका वेदोंमें प्रसिद्ध ‘शत्रुघ्न’ नाम है॥४॥
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥१९७॥
भावार्थ
जो शुभ लक्षणोंके धाम, श्रीरामजीके प्यारे और सारे जगत्के आधार हैं, गुरु वसिष्ठजीने उनका ‘लक्ष्मण’ ऐसा श्रेष्ठ नाम रखा॥१९७॥
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