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दोहा 195

चौ०

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥ वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥१॥

भावार्थ

कैकेयी और सुमित्रा—इन दोनोंने भी सुन्दर पुत्रोंको जन्म दिया। उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाजका वर्णन सरस्वती और सर्पोंके राजा शेषजी भी नहीं कर सकते॥१॥

चौ०

अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥ देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥२॥

भावार्थ

अवधपुरी इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो रात्रि प्रभुसे मिलने आयी हो और सूर्यको देखकर मानो मनमें सकुचा गयी हो, परन्तु फिर भी मनमें विचारकर वह मानो सन्ध्या बन [कर रह] गयी हो॥२॥

चौ०

अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥ मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥३॥

भावार्थ

अगरकी धूपका बहुत-सा धुआँ मानो [सन्ध्याका] अन्धकार है और जो अबीर उड़ रहा है, वह उसकी ललाई है। महलोंमें जो मणियोंके समूह हैं, वे मानो तारागण हैं। राजमहलका जो कलश है, वही मानो श्रेष्ठ चन्द्रमा है॥३॥

चौ०

भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मुखर समयँ जनु सानी॥ कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥४॥

भावार्थ

राजभवनमें जो अति कोमल वाणीसे वेदध्वनि हो रही है, वही मानो समयसे-(समयानुकूल) सनी हुई पक्षियोंकी चहचहाहट है। यह कौतुक देखकर सूर्य भी [अपनी चाल] भूल गये। एक महीना उन्होंने जाता हुआ न जाना (अर्थात् उन्हें एक महीना वहीं बीत गया)॥४॥

दो०

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ। रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥१९५॥

भावार्थ

महीनेभरका दिन हो गया। इस रहस्यको कोई नहीं जानता। सूर्य अपने रथसहित वहीं रुक गये, फिर रात किस तरह होती॥ १९५॥

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