दोहा 191
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥१॥
भावार्थ
पवित्र चैत्रका महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवान्का प्रिय अभिजित् मुहूर्त्त था। दोपहरका समय था। न बहुत सरदी थी, न धूप ( गरमी ) थी। वह पवित्र समय सब लोकोंको शान्ति देनेवाला था॥ १ ॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥ बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥२॥
भावार्थ
शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतोंके मनमें [ बड़ा ] चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतोंके समूह मणियोंसे जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृतकी धारा बहा रही थीं॥ २ ॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥ गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥३॥
भावार्थ
जब ब्रह्माजीने वह ( भगवान्के प्रकट होनेका ) अवसर जाना तब [ उनके समेत ] सारे देवता विमान सजा-सजाकर चले। निर्मल आकाश देवताओंके समूहोंसे भर गया। गन्धर्वोंके दल गुणोंका गान करने लगे॥ ३ ॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥ अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥४॥
भावार्थ
और सुन्दर अञ्जलियोंमें सजा-सजाकर पुष्प बरसाने लगे। आकाशमें घमाघम नगाड़े बजने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकारसे अपनी-अपनी सेवा ( उपहार ) भेंट करने लगे॥ ४ ॥
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम। जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥१९१॥
भावार्थ
देवताओंके समूह विनती करके अपने-अपने लोकमें जा पहुँचे। समस्त लोकोंको शान्ति देनेवाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए॥ १९१ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें