दोहा 19
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥ बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥१॥
भावार्थ
मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु ( अग्नि ), भानु ( सूर्य ) और हिमकर ( चन्द्रमा ) का हेतु अर्थात् ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है। वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है॥१॥
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥२॥
भावार्थ
जो महामन्त्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशीमें मुक्तिका कारण है, तथा जिसकी महिमाको गणेशजी जानते हैं, जो इस ‘राम’ नामके प्रभावसे ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥२॥
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥ सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥ ३॥
भावार्थ
आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामके प्रतापको जानते हैं, जो उलटा नाम ( ‘मरा’, ‘मरा’ ) जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजीके इस वचनको सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नामके समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति ( श्रीशिवजी ) के साथ राम-नामका जप करती रहती हैं॥३॥
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥ नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥४॥
भावार्थ
नामके प्रति पार्वतीजीके हृदयकी ऐसी प्रीति देखकर श्रीशिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियोंमें भूषणरूप ( पतिव्रताओंमें शिरोमणि ) पार्वतीजीको अपना भूषण बना लिया ( अर्थात् उन्हें अपने अङ्गमें धारण करके अर्द्धाङ्गिनी बना लिया )। नामके प्रभावको श्रीशिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस ( प्रभाव ) के कारण कालकूट जहरने उनको अमृतका फल दिया॥४॥
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥१९॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं॥१९॥
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