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दोहा 188

राजा दशरथका पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियोंका गर्भवती होना

चौ०

गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥ जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥१॥

भावार्थ

सब देवता अपने-अपने लोकको गये। पृथ्वीसहित सबके मनको शान्ति मिली। ब्रह्माजीने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने [ वैसा करनेमें ] देर नहीं की॥ १ ॥

चौ०

बनचर देह धरी छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं ॥ गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥२॥

भावार्थ

पृथ्वीपर उन्होंने वानरदेह धारण की। उनमें अपार बल और प्रताप था। सभी शूरवीर थे; पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके शस्त्र थे। वे धीर बुद्धिवाले [ वानररूप देवता ] भगवान्‌के आनेकी राह देखने लगे॥ २ ॥

चौ०

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥३॥

भावार्थ

वे [ वानर ] पर्वतों और जंगलोंमें जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुन्दर सेना बनाकर भरपूर छा गये। यह सब सुन्दर चरित्र मैंने कहा। अब वह चरित्र सुनो जिसे बीचहीमें छोड़ दिया था॥ ३ ॥

चौ०

अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥ धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥४॥

भावार्थ

अवधपुरीमें रघुकुलशिरोमणि दशरथ नामके राजा हुए, जिनका नाम वेदोंमें विख्यात है। वे धर्म-धुरन्धर, गुणोंके भण्डार और ज्ञानी थे। उनके हृदयमें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान्‌की भक्ति थी, और उनकी बुद्धि भी उन्हींमें लगी रहती थी॥ ४ ॥

दो०

कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत। पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥१८८॥

भावार्थ

उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरणवाली थीं। वे [ बड़ी ] विनीत और पतिके अनुकूल [ चलनेवाली ] थीं और श्रीहरिके चरणकमलोंमें उनका दृढ़ प्रेम था॥ १८८ ॥

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