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दोहा 178b

चौ०

तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥ मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥१॥

भावार्थ

उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गये और वे ( तीनों भाई ) हर्षित होकर अपने घर लौट आये। मय दानवकी मन्दोदरी नामकी कन्या परम सुन्दरी और स्त्रियोंमें शिरोमणि थी॥१॥

चौ०

सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥ हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥२॥

भावार्थ

मयने उसे लाकर रावणको दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसोंका राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयोंका विवाह कर दिया॥२॥

चौ०

गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥३॥

भावार्थ

समुद्रके बीचमें त्रिकूट नामक पर्वतपर ब्रह्माका बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। [ महान्‌ मायावी और निपुण कारीगर ] मय दानवने उसको फिरसे सजा दिया। उसमें मणियोंसे जड़े हुए सोनेके अनगिनत महल थे॥३॥

चौ०

भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥ तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥४॥

भावार्थ

जैसी नागकुलके रहनेकी [ पाताललोकमें ] भोगावती पुरी है और इन्द्रके रहनेकी [ स्वर्गलोकमें ] अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुन्दर और बाँका वह दुर्ग था। जगत्‌में उसका नाम लङ्का प्रसिद्ध हुआ॥४॥

दो०

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनिखचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥१७८ (क)॥

भावार्थ

उसे चारों ओरसे समुद्रकी अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस [ दुर्ग ] के मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरीका वर्णन नहीं किया जा सकता॥१७८ (क)॥

दो०

हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥१७८ (ख)॥

भावार्थ

भगवान्‌की प्रेरणासे जिस कल्पमें जो राक्षसोंका राजा ( रावण ) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान्‌ अपनी सेनासहित उस पुरीमें बसता है॥१७८ (ख)॥

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