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दोहा 175

रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार

चौ०

अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥ सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किय जेहीं॥१॥

भावार्थ

ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गये। नगरवासियोंने [ जब ] यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाताको दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते-बनाते कौआ कर दिया ( ऐसे पुण्यात्मा राजाको देवता बनाना चाहिये था, सो राक्षस बना दिया )॥१॥

चौ०

उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥ तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥२॥

भावार्थ

पुरोहितको उसके घर पहुँचाकर असुर ( कालकेतु ) ने [ कपटी ] तपस्वीको खबर दी। उस दुष्टने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब [ वैरी ] राजा सेना सजा-सजाकर [ चढ़ ] दौड़े॥२॥

चौ०

घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥ जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥३॥

भावार्थ

और उन्होंने डंका बजाकर नगरको घेर लिया। नित्यप्रति अनेक प्रकारसे लड़ाई होने लगी। [ प्रतापभानुके ] सब योद्धा [ शूरवीरोंकी ] करनी करके रणमें जूझ मरे। राजा भी भाईसहित खेत रहा॥३॥

चौ०

सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥ रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥४॥

भावार्थ

सत्यकेतुके कुलमें कोई नहीं बचा। ब्राह्मणोंका शाप झूठा कैसे हो सकता था। शत्रुको जीतकर, नगरको [ फिरसे ] बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने-अपने नगरको चले गये॥४॥

दो०

भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम। धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥१७५॥

भावार्थ

[ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरुपर्वतके समान ( भारी और कुचल डालनेवाली ), पिता यमके समान ( कालरूप ) और रस्सी साँपके समान ( काट खानेवाली ) हो जाती है॥१७५॥

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