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दोहा 167

चौ०

सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥ अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥१॥

भावार्थ

[तपस्वीने कहा— ] हे राजन्! सुनो, संसारमें उपाय तो बहुत हैं; पर वे कष्टसाध्य हैं (बड़ी कठिनतासे बननेमें आते हैं) और इसपर भी सिद्ध हों या न हों (उनकी सफलता निश्चित नहीं है) हाँ, एक उपाय बहुत सहज है; परन्तु उसमें भी एक कठिनता है॥ १॥

चौ०

मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥ आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥२॥

भावार्थ

हे राजन्! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगरमें हो नहीं सकता। जबसे पैदा हुआ हूँ, तबसे आजतक मैं किसीके घर अथवा गाँव नहीं गया॥ २॥

चौ०

जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥ सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥३॥

भावार्थ

परंतु यदि नहीं जाता हूँ, तो तुम्हारा काम बिगड़ता है। आज यह बड़ा असमंजस आ पड़ा है। यह सुनकर राजा कोमल वाणीसे बोला, हे नाथ! वेदोंमें ऐसी नीति कही है कि— ॥ ३॥

चौ०

बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥ जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥४॥

भावार्थ

बड़े लोग छोटोंपर स्नेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरोंपर सदा तृण (घास) को धारण किये रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तकपर फेनको धारण करता है, और धरती अपने सिरपर सदा धूलिको धारण किये रहती है॥ ४॥

दो०

अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल। मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥१६७॥

भावार्थ

ऐसा कहकर राजाने मुनिके चरण पकड़ लिये। [और कहा— ] हे स्वामी! कृपा कीजिये। आप संत हैं। दीनदयालु हैं। [अतः] हे प्रभो! मेरे लिये इतना कष्ट [अवश्य] सहिये॥ १६७॥

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