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दोहा 165

चौ०

कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥ कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥१॥

भावार्थ

तपस्वीने कहा—हे राजन्! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो। हे पृथ्वीके स्वामी! केवल ब्राह्मणकुलको छोड़ काल भी तुम्हारे चरणोंपर सिर नवायेगा॥ १॥

चौ०

तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥ जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥२॥

भावार्थ

तपके बलसे ब्राह्मण सदा बलवान्‌ रहते हैं। उनके क्रोधसे रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणोंको वशमें कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायँगे॥ २॥

चौ०

चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥ बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥३॥

भावार्थ

ब्राह्मणकुलसे जोर-जबर्दस्ती नहीं चल सकती, मैं दोनों भुजा उठाकर सत्य कहता हूँ। हे राजन्! सुनो, ब्राह्मणोंके शाप बिना तुम्हारा नाश किसी कालमें नहीं होगा॥ ३॥

चौ०

हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥ तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥४॥

भावार्थ

राजा उसके वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा—हे स्वामी! मेरा नाश अब नहीं होगा। हे कृपानिधान प्रभु! आपकी कृपासे मेरा सब समय कल्याण होगा॥ ४॥

दो०

एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥१६५॥

भावार्थ

‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला—[किन्तु] तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जानेकी बात किसीसे [कहना नहीं, यदि] कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं॥ १६५॥

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