दोहा 160
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥ नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥१॥
भावार्थ
हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़ेको वृक्षसे बाँधकर राजा बैठ गया। राजाने उसकी बहुत प्रकारसे प्रशंसा की और उसके चरणोंकी वन्दना करके अपने भाग्यकी सराहना की॥१॥
पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥ मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥२॥
भावार्थ
फिर सुन्दर कोमल वाणीसे कहा—हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम [ धाम ] विस्तारसे बतलाइये॥२॥
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥ बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥३॥
भावार्थ
राजाने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजाको पहचान गया था। राजा तो शुद्धहृदय था और वह कपट करनेमें चतुर था। एक तो वैरी, फिर जातिका क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बलसे अपना काम बनाना चाहता था॥३॥
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥ सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥४॥
भावार्थ
वह शत्रु अपने राज्य-सुखको समझ करके (स्मरण करके) दुःखी था। उसकी छाती [ कुम्हारके ] आँवेकी आगकी तरह [ भीतर-ही-भीतर ] सुलग रही थी। राजाके सरल वचन कानसे सुनकर, अपने वैरको यादकर वह हृदयमें हर्षित हुआ॥४॥
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥१६०॥
भावार्थ
वह कपटमें डुबोकर बड़ी युक्तिके साथ कोमल वाणी बोला—अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन) हैं॥१६०॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें