दोहा 16
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥ प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥१॥
भावार्थ
मैं अति पवित्र श्रीअयोध्यापुरी और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली श्रीसरयू नदीकी वन्दना करता हूँ। फिर अवधपुरीके उन नर-नारियोंको प्रणाम करता हूँ जिनपर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी ममता थोड़ी नहीं है ( अर्थात् बहुत है )॥१॥
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥ बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥२॥
भावार्थ
उन्होंने [ अपनी पुरीमें रहनेवाले ] सीताजीकी निन्दा करनेवाले ( धोबी और उसके समर्थक पुर-नर-नारियों ) के पापसमूहको नाश कर उनको शोकरहित बनाकर अपने लोक ( धाम ) में बसा दिया। मैं कौसल्यारूपी पूर्व दिशाकी वन्दना करता हूँ, जिसकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही है॥२॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥ दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥३॥ करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥ जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥४॥
भावार्थ
जहाँ ( कौसल्यारूपी पूर्व दिशा ) से विश्वको सुख देनेवाले और दुष्टरूपी कमलोंके लिये पालेके समान श्रीरामचन्द्रजीरूपी सुन्दर चन्द्रमा प्रकट हुए। सब रानियोंसहित राजा दशरथजीको पुण्य और सुन्दर कल्याणकी मूर्ति मानकर मैं मन, वचन और कर्मसे प्रणाम करता हूँ। अपने पुत्रका सेवक जानकर वे मुझपर कृपा करें, जिनको रचकर ब्रह्माजीने भी बड़ाई पायी तथा जो श्रीरामजीके माता और पिता होनेके कारण महिमाकी सीमा हैं॥३-४॥
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥१६॥
भावार्थ
मैं अवधके राजा श्रीदशरथजीकी वन्दना करता हूँ, जिनका श्रीरामजीके चरणोंमें सच्चा प्रेम था, जिन्होंने दीनदयालु प्रभुके बिछुड़ते ही अपने प्यारे शरीरको मामूली तिनकेकी तरह त्याग दिया॥१६॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें