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दोहा 13

कवि-वन्दना

चौ०

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥ तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥१॥

भावार्थ

यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुताको सब ऐसी ( अकथनीय ) ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेदने ऐसा कारण बताया है कि भजनका प्रभाव बहुत तरहसे कहा गया है। ( अर्थात्‌ भगवान्‌की महिमाका पूरा वर्णन तो कोई कर नहीं सकता; परन्तु जिससे जितना बन पड़े उतना भगवान्‌का गुणगान करना चाहिये। क्योंकि भगवान्‌के गुणगानरूपी भजनका प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकारसे शास्त्रोंमें वर्णन है। थोड़ा-सा भी भगवान्‌का भजन मनुष्यको सहज ही भवसागरसे तार देता है )॥१॥

चौ०

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥ ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥२॥

भावार्थ

जो परमेश्वर एक हैं, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विश्वरूप हैं, उन्हीं भगवान्‌ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारकी लीला की है॥२॥

चौ०

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥ जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥३॥

भावार्थ

वह लीला केवल भक्तोंके हितके लिये ही है; क्योंकि भगवान्‌ परम कृपालु हैं और शरणागतके बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तोंपर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिसपर कृपा कर दी, उसपर फिर कभी क्रोध नहीं किया॥३॥

चौ०

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥ बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥४॥

भावार्थ

वे प्रभु श्रीरघुनाथजी गयी हुई वस्तुको फिर प्राप्त करानेवाले, गरीबनिवाज ( दीनबन्धु ), सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान्‌ और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान्‌ लोग उन श्रीहरिका यश वर्णन करके अपनी वाणीको पवित्र और उत्तम फल ( मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम ) देनेवाली बनाते हैं॥४॥

चौ०

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥ मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥५॥

भावार्थ

उसी बलसे ( महिमाका यथार्थ वर्णन नहीं, परन्तु महान्‌ फल देनेवाला भजन समझकर भगवत्कृपाके बलपर ही ) मैं श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथा कहूँगा। इसी विचारसे [ वाल्मीकि, व्यास आदि ] मुनियोंने पहले हरिकी कीर्ति गायी है, भाई! उसी मार्गपर चलना मेरे लिये सुगम होगा॥५॥

दो०

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥१३॥

भावार्थ

जो अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियाँ हैं, यदि राजा उनपर पुल बँधा देता है तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उनपर चढ़कर बिना ही परिश्रमके पार चली जाती हैं [ इसी प्रकार मुनियोंके वर्णनके सहारे मैं भी श्रीरामचरित्रका वर्णन सहज ही कर सकूँगा ]॥१३॥

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