दोहा 128
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥ संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥१॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। श्रीशिवजीके वचन नारदजीके मनको अच्छे नहीं लगे, तब वे वहाँसे ब्रह्मलोकको चल दिये॥१॥
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥ छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥२॥
भावार्थ
एक बार गानविद्यामें निपुण मुनिनाथ नारदजी हाथमें सुन्दर वीणा लिये, हरिगुण गाते हुए क्षीरसागरको गये, जहाँ वेदोंके मस्तकस्वरूप (मूर्तिमान् वेदान्ततत्त्व) लक्ष्मीनिवास भगवान् नारायण रहते हैं॥२॥
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥ बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥३॥
भावार्थ
रमानिवास भगवान् उठकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और ऋषि (नारदजी) के साथ आसनपर बैठ गये। चराचरके स्वामी भगवान् हँसकर बोले—हे मुनि! आज आपने बहुत दिनोंपर दया की॥३॥
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥ अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥४॥
भावार्थ
यद्यपि श्रीशिवजीने उन्हें पहलेसे ही बरज रखा था, तो भी नारदजीने कामदेवका सारा चरित्र भगवान्को कह सुनाया। श्रीरघुनाथजीकी माया बड़ी ही प्रबल है। जगत्में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोहित न कर दे॥४॥
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान। तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥१२८॥
भावार्थ
भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले—हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है?]॥१२८॥
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