दोहा 113
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥ १ ॥
भावार्थ
फिर भी तुमने इसीलिये वही ( पुरानी ) शङ्का की है कि इस प्रसङ्गके कहने-सुननेसे सबका कल्याण होगा। जिन्होंने अपने कानोंसे भगवान्की कथा नहीं सुनी, उनके कानोंके छिद्र साँपके बिलके समान हैं॥१॥
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥ २ ॥
भावार्थ
जिन्होंने अपने नेत्रोंसे संतोंके दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोरके पंखोंपर दीखनेवाली नकली आँखोंकी गिनतीमें हैं। वे सिर कड़वी तूँबीके समान हैं, जो श्रीहरि और गुरुके चरणतलपर नहीं झुकते॥२॥
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥ जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥ ३ ॥
भावार्थ
जिन्होंने भगवान्की भक्तिको अपने हृदयमें स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीते हुए ही मुर्देके समान हैं। जो जीभ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान है॥३॥
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥ गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥४॥
भावार्थ
वह हृदय वज्रके समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान्के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजीकी लीला सुनो, यह देवताओंका कल्याण करनेवाली और दैत्योंको विशेषरूपसे मोहित करनेवाली है॥४॥
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि। सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि॥११३॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कामधेनुके समान सेवा करनेसे सब सुखोंको देनेवाली है, और सत्पुरुषोंके समाज ही सब देवताओंके लोक हैं, ऐसा जानकर इसे कौन न सुनेगा!॥११३॥
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