शिवताण्डवस्तोत्रम्
परंपरा से रावण रचित माना जाता है
शिव ताण्डव स्तोत्र में डमरू की ध्वनि, लहराते सर्पों और ललाट की अग्नि के साथ शिवजी के नृत्य का वर्णन है। भक्त नियमित पूजा में और सूर्यास्त के आसपास प्रदोष के समय पूजा के अंत में इसका पाठ करके भक्ति, निर्मल मन और समभाव माँगते हैं।
सम्पूर्ण बोल
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥
Jataatavi galaj jala pravaaha paavita sthaleGale avalambya lambitaam bhujanga tunga maalikaamDamad damad damad daman ninaada vad damarvayamChakaara chanda taandavam tanotu nah Shivah Shivam
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥
Jataa kataaha sambhrama bhraman nilimpa nirjhariVilola veechi vallari viraajamaana moordhaniDhagad dhagad dhagaj jvalal lalaata patta paavakeKishora chandra shekhare ratih pratikshanam mama
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥
Dharaadharendra nandini vilaasa bandhu bandhuraSphurad diganta santati pramodamaana maanaseKripaa kataaksha dhorani niruddha durdharaapadiKvachid digambare mano vinodam etu vastuni
कुछ पाठों में 'क्वचिच्चिदम्बरे' गाया जाता है।
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥
Jataa bhujanga pingala sphurat phanaa mani prabhaaKadamba kunkuma drava pralipta dig vadhoo mukheMadaandha sindhura sphurat tvag uttareeya medureMano vinodam adbhutam bibhartu bhoota bhartari
कुछ पाठों में 'मदान्ध सिन्धुरासुर त्वग्' गाया जाता है।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥
Sahasra lochana prabhrity ashesha lekha shekharaPrasoona dhooli dhorani vidhoosaraanghri peetha bhoohBhujanga raaja maalayaa nibaddha jaata jootakahShriyai chiraaya jaayataam chakora bandhu shekharah
'श्रियै' की जगह 'श्रिये' भी गाया जाता है।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥६॥
Lalaata chatvara jvalad dhananjaya sphulingabhaaNipeeta pancha saayakam naman nilimpa naayakamSudhaa mayookha lekhayaa viraajamaana shekharamMahaakapaali sampade shiro jataalam astu nah
एक प्रचलित पाठ है 'महः कपालि सम्पदे सरिज् जटालम् अस्तु नः'।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥
Karaala bhaala pattikaa dhagad dhagad dhagaj jvalaDdhananjayaahuti krita prachanda pancha saayakeDharaadharendra nandini kuchaagra chitra patrakaPrakalpanaika shilpini trilochane ratir mama
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥
Naveena megha mandali niruddha durdhara sphuratKuhoo nisheethini tamah prabandha baddha kandharahNilimpa nirjhari dharas tanotu kritti sindhurahKalaa nidhaana bandhurah shriyam jagad dhurandharah
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- ऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥
Praphulla neela pankaja prapancha kaalima prabhaaValambi kantha kandali ruchi prabaddha kandharamSmara chhidam pura chhidam bhava chhidam makha chhidamGaja chhidaandhaka chhidam tam antaka chhidam bhaje
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥
Akharva sarva mangalaa kalaa kadamba manjariRasa pravaaha maadhuri vijrimbhanaa madhu vratamSmaraantakam puraantakam bhavaantakam makhaantakamGajaantakaandhakaantakam tam antakaantakam bhaje
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥
Jayatv adabhra vibhrama bhramad bhujangama shvasaDvinirgamat krama sphurat karaala bhaala havya vaatDhimid dhimid dhimid dhvanan mridanga tunga mangalaDhvani krama pravartita prachanda taandavah Shivah
कुछ पाठों में 'धिमिं धिमिं धिमिं ध्वनन्' गाया जाता है।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥
Drishad vichitra talpayor bhujanga mauktika srajorGarishtha ratna loshthayoh suhrid vipaksha pakshayohTrinaaravinda chakshushoh prajaa mahee mahendrayohSama pravrittikah kadaa Sadaashivam bhajaamy aham
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥
Kadaa nilimpa nirjhari nikunja kotare vasanVimukta durmatih sadaa shirahstham anjalim vahanVilola lola lochano lalaama bhaala lagnakahShiveti mantram uchcharan kadaa sukhee bhavaamy aham
निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः॥१४॥
Nilimpa naatha naagari kadamba maula mallikaaNigumpha nirbhara ksharan madhooshnikaa manoharahTanotu no mano mudam vinodineem aharnishamParashriyah param padam tad angaja tvishaam chayah
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पना। विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम्॥१५॥
Prachanda vaadavaanala prabhaa shubha prachaaraniMahaashta siddhi kaamini janaavahoota jalpanaaVimukta vaama lochanaa vivaaha kaalika dhvanihShiveti mantra bhooshanaa jagaj jayaaya jaayataam
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१६॥
Imam hi nityam evam uktam uttamottamam stavamPathan smaran bruvan naro vishuddhim eti santatamHare gurau subhaktim aashu yaati naanyathaa gatimVimohanam hi dehinaam Sushankarasya chintanam
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥१७॥
Poojaavasaana samaye dasha vaktra geetamYah Shambhu poojana param pathati pradosheTasya sthiraam ratha gajendra turanga yuktaamLakshmeem sadaiva sumukheem prada daati Shambhuh
कुछ पाठों में 'लक्ष्मीं प्रसाद समये प्रददाति शम्भुः' गाया जाता है।
पदों का अर्थ
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥
शिवजी हमारा कल्याण करें। उनकी जटाओं के वन से बहता जल उनके गले को पवित्र करता है, गले में सर्पों की लम्बी माला लटकती है और डमरू की गूँज पर वे प्रचण्ड ताण्डव करते हैं।
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥
मेरा प्रेम हर क्षण उन शिवजी में लगा रहे, जिनके सिर पर नया चन्द्रमा सुशोभित है। उनकी जटाओं में स्वर्ग की गंगा की लहरें घूम रही हैं और ललाट पर अग्नि धधक रही है।
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥
मेरा मन उन दिगम्बर शिवजी में आनन्द पाए, जो दिशाओं को ही अपना वस्त्र बनाए हुए हैं। पर्वतराज की पुत्री पार्वती की लीलाओं से उनका मन प्रसन्न है और उनकी कृपाभरी दृष्टि की धारा कठिन से कठिन विपत्ति को रोक देती है।
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥
मेरा मन सब प्राणियों का पालन करने वाले शिवजी में आनन्द पाए। उनकी जटाओं के भूरे सर्पों के फणों की मणियों से दिशाओं पर केसर जैसी आभा फैल रही है और वे मदमस्त हाथी की खाल ओढ़े हुए हैं।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥
चन्द्रमा को सिर पर धारण करने वाले शिवजी हमें स्थायी मंगल दें। इन्द्र और दूसरे देवताओं के मुकुटों के फूलों की धूल उनके चरणों पर पड़ती है और सर्पराज उनकी जटाओं को बाँधे हुए हैं।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥६॥
कपाल धारण करने वाले शिवजी का जटाओं से सुशोभित मस्तक हमारा कल्याण करे। उनके ललाट की अग्नि की चिनगारियों ने पाँच बाणों वाले कामदेव को भस्म कर दिया, देवता उन्हें प्रणाम करते हैं और चन्द्रमा की अमृतमयी किरण उनके सिर को सुशोभित करती है।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥
मेरा प्रेम तीन नेत्रों वाले शिवजी में रहे। उनके ललाट की धधकती अग्नि में शक्तिशाली कामदेव आहुति बन गए, और वही शिवजी प्रेम से पार्वती के वक्ष पर पत्तियों के सुन्दर चित्र बनाते हैं।
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥
संसार का भार सँभालने वाले शिवजी हमें मंगल दें। उनका कण्ठ नए बादलों से ढकी अमावस्या की आधी रात जैसा गहरा है, वे स्वर्ग की गंगा को धारण करते हैं, हाथी की खाल पहनते हैं और चन्द्रमा से सुशोभित हैं।
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- ऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥
मैं शिवजी को भजता हूँ, जिनके गहरे कण्ठ में खिले हुए नीले कमलों जैसी शोभा है। वे कामदेव, त्रिपुर, संसार के बन्धन, यज्ञ, गजासुर और अन्धक का नाश करते हैं और मृत्यु को भी जीत लेते हैं।
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥
मैं उन शिवजी को भजता हूँ, जो पार्वती की मंगलमयी शोभा की मधुरता में भौंरे की तरह आनन्द लेते हैं। वे कामदेव, त्रिपुर, संसार के बन्धन, यज्ञ, गजासुर और अन्धक का अन्त करते हैं और मृत्यु का भी अन्त करने वाले हैं।
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥
शिवजी की जय हो, जिनका प्रचण्ड ताण्डव मृदंग की ऊँची मंगलध्वनि की ताल पर चलता है। उनके चारों ओर घूमते सर्पों की साँस से ललाट की भयंकर अग्नि और धधक उठती है।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥
मेरी चाह है कि सदाशिव को ऐसे समभाव से भजूँ कि पत्थर और सुन्दर बिछौना, सर्पों की माला और मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी का ढेला मुझे समान लगें। मित्र और शत्रु, तिनका और कमलनयनी सुन्दरी, साधारण प्रजा और राजा के प्रति भी मेरा मन समान रहे।
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥
मेरी चाह है कि स्वर्ग की गंगा के पास किसी लता-कुंज में रहूँ, बुरे विचारों से मुक्त होऊँ और हाथ जोड़कर सिर पर रखूँ। भक्ति में डोलते नेत्रों और शिवजी के शोभायमान ललाट में लगे ध्यान के साथ शिव नाम का उच्चारण करते हुए मैं सुख पाना चाहता हूँ।
निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः॥१४॥
शिवजी के अंगों की एकत्र आभा, जो दिव्य शोभा का परम स्थान है, हमारे मन को दिन-रात आनन्द दे। देवराज की नगरी की स्त्रियों के केशों में गुँथी चमेली की मालाओं से झरती मधुरता उसे मनोहर बनाती है।
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पना। विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम्॥१५॥
शिव नाम के मन्त्र से सजी मंगलध्वनि सारे जगत में जय पाए। उसकी आभा समुद्र की प्रचण्ड अग्नि जैसी है, आठ महान सिद्धियाँ स्त्रीरूप में इस स्तुति का गान करती हैं और सुन्दर नेत्रों वाली स्त्रियाँ विवाह के समय इसे गाती हैं।
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१६॥
जो मनुष्य इस उत्तम स्तुति को नियमित पढ़ता, याद करता और बोलता है, वह निरन्तर पवित्र होता है और गुरु शिवजी में सच्ची भक्ति पाकर दूसरी ओर नहीं भटकता। कल्याणकारी शंकर का चिन्तन देहधारी जीवों के मन को मुग्ध कर लेता है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥१७॥
इस फलश्रुति में कहा गया है कि जो प्रदोष के समय पूजा के अन्त में दस मुखों वाले रावण के गाए इस शिवस्तवन को पढ़ता है, उसे शम्भु रथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त स्थायी, अनुकूल सम्पदा देते हैं। यह पाठ के फल की भक्तिभरी स्तुति है।
इस रचना के बारे में
शिव ताण्डव स्तोत्र संस्कृत के स्तोत्र साहित्य की रचना है। परम्परा इसे रावण से जोड़ती है और इसकी समापन पंक्ति भी उन्हें रचयिता बताती है। इससे ऐतिहासिक लेखक या रचना का समय तय नहीं होता। यह एक स्वतंत्र स्तोत्र है, महर्षि वाल्मीकि की रामायण या गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का अंश नहीं। सत्रह श्लोकों वाला यह रूप संस्कृत डॉक्युमेंट्स के मुख्य पाठ का अनुसरण करता है। पहले पन्द्रह श्लोक शिवस्तुति हैं और अन्तिम दो फलश्रुति हैं।
इसके पीछे की कथा
बाद की परम्परा मानती है कि रावण ने कैलाश उठाने के प्रयास के बाद यही स्तोत्र गाया था। महर्षि वाल्मीकि की रामायण के उत्तरकाण्ड, सर्ग 16, श्लोक 25 से 35 में पर्वत उठाने की कथा आती है। शिवजी पैर के अँगूठे से पर्वत दबाते हैं और रावण की भुजाएँ उसके नीचे दब जाती हैं। रावण प्रणाम करके सामवेद के मन्त्रों और अन्य स्तुतियों से शिवजी को प्रसन्न करते हैं। तब शिवजी उनकी भुजाएँ मुक्त करते हैं। वाल्मीकि उन स्तुतियों को शिव ताण्डव स्तोत्र नहीं कहते। रामचरितमानस के लंकाकाण्ड, दोहा 20, चौपाई 2 में रावण के शिवजी और ब्रह्माजी की पूजा करने का उल्लेख है। श्री राम रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना और पूजा करते हैं: “लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥ ३ ॥” (रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, दोहा 2, चौपाई 3)। श्री राम कहते हैं कि शिवजी के समान उन्हें कोई प्रिय नहीं है। इन प्रसंगों को पढ़ते हुए हम अपनी पूजा में विनम्रता का स्थान देखें।
यह रचना क्या सिखाती है
स्तोत्र में प्रचण्ड ताण्डव की स्तुति के बाद भक्त अपने मन में समभाव माँगता है। बारहवें श्लोक का समप्रवृत्तिकः शब्द समान भाव रखने की बात कहता है। हम लोगों को अपने लाभ और हानि से तौलते हैं। भक्ति इस आदत को पहचानने में हमारी सहायता करे।
रावण की शिवभक्ति उन्हें अहंकार के परिणाम से नहीं बचा सकी। हमें भी अपने व्यवहार को देखना है। मान लीजिए, कोई व्यक्ति बड़े ध्यान से स्तोत्र का अभ्यास करता है। घर में कोई छूटा हुआ काम याद दिला दे तो वह चिढ़ जाता है। पाठ तो याद रहा। बात सुनने का धीरज नहीं रहा। इसी तरह पूजा के साथ दूसरों की उचित बात सुनने का अभ्यास भी चाहिए।
सही उच्चारण सीखने में मेहनत लगती है। अर्थ को जीवन में उतारने पर भी ध्यान दें। आज एक श्लोक पढ़ने के बाद थोड़ा ठहरें, शिवजी का स्मरण करें और अपनी सफाई दिए बिना किसी की एक उचित बात स्वीकार करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव ताण्डव स्तोत्र का अर्थ क्या है?
शिव ताण्डव स्तोत्र का अर्थ है शिवजी के प्रचण्ड दिव्य नृत्य की स्तुति। इसके श्लोक उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं और कल्याण, भक्ति, मन की शुद्धि तथा समभाव की प्रार्थना करते हैं।
शिव ताण्डव स्तोत्र किसने लिखा था?
परम्परा इसे रावण की रचना मानती है और इसकी समापन पंक्ति भी उन्हें रचयिता बताती है। यह पारम्परिक मान्यता है। इससे ऐतिहासिक लेखक या रचना का समय तय नहीं होता।
शिव ताण्डव स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?
सोलहवाँ श्लोक नियमित पाठ और स्मरण की बात करता है। सत्रहवें श्लोक में सूर्यास्त के आसपास के प्रदोष समय में शिवपूजा के अन्त में पाठ का उल्लेख है। ऐसी गति से पढ़ें जिसमें शब्दों और अर्थ पर ध्यान रहे।
शिव ताण्डव स्तोत्र पढ़ने के क्या लाभ हैं?
इसकी फलश्रुति में नियमित पाठ और स्मरण से मन की शुद्धि और शिवभक्ति की बात कही गई है। अन्तिम श्लोक शम्भु की कृपा से सम्पदा मिलने की स्तुति करता है। इन्हें भक्तिभाव से पढ़ें और विनम्रता से प्रार्थना करें। पाठ को धन या किसी निश्चित परिणाम की गारंटी न मानें।
क्या शिव ताण्डव स्तोत्र रामायण में है और इसके श्लोकों की संख्या अलग क्यों मिलती है?
यह स्वतंत्र संस्कृत स्तोत्र है, महर्षि वाल्मीकि की रामायण या रामचरितमानस का अंश नहीं। अलग पाठों में कुछ श्लोक जुड़ते या छूटते हैं, इसलिए श्लोकों की संख्या और क्रमांक बदल जाते हैं।
इसे ऐसे भी लिखा जाता है: Shiv Tandav Stotram · Shiva Tandava Stotram · Shiv Tandav Stotra · Shiv Tandav lyrics · Ravan Shiv Tandav · शिव तांडव स्तोत्र · शिव ताण्डव स्तोत्रम् · शिवताण्डवस्तोत्रम्