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श्रीहनुमान चालीसा

गोस्वामी तुलसीदास

हनुमान चालीसा में हनुमानजी के समुद्र लाँघने, माता सीता को खोजने और लक्ष्मणजी के लिए संजीवनी लाने का गान है। भक्त रोज की पूजा में, खासकर मंगलवार और शनिवार को, इसका पाठ करते हैं और बल, अच्छी बुद्धि तथा संकट में सहारा माँगते हैं।

सम्पूर्ण बोल

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

Shri Guru charan saroj raj, nij manu mukuru sudhaariBaranau Raghubar bimal jasu, jo daayaku phal chaari

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

Buddhiheen tanu jaanike, sumirau Pawan KumarBal buddhi bidya dehu mohi, harahu kales bikaar

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

Jai Hanuman gyaan gun saagarJai Kapees tihu lok ujaagar

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥२॥

Ram doot atulit bal dhaamaAnjani putra Pawansut naama

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

Mahabeer bikram BajrangiKumati nivaar sumati ke sangi

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥

Kanchan baran biraaj subesaKaanan kundal kunchit kesa

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥५॥

Haath bajra au dhwaja biraajaiKaandhe moonj janeu saajai

कहीं कहीं 'और ध्वजा' या 'अरु ध्वजा' भी गाया जाता है।

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥६॥

Sankar suvan Kesari nandanTej prataap maha jag bandan

'शंकर स्वयं' भी गाया जाता है। दोनों पाठ भक्ति परंपरा में हैं।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥७॥

Bidyavaan guni ati chaaturRam kaaj karibe ko aatur

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥८॥

Prabhu charitra sunibe ko rasiyaRam Lakhan Sita man basiya

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

Sookshma roop dhari Siyahi dikhaavaBikat roop dhari Lank jaraava

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥

Bheem roop dhari asur sanhaareRamchandra ke kaaj sanvaare

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥११॥

Laay sajeevan Lakhan jiyaayeShri Raghubeer harashi ur laaye

कहीं कहीं 'लाय संजीवन' या 'लाय संजीवनी' भी गाया जाता है।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥

Raghupati keenhi bahut badaaiTum mam priya Bharatahi sam bhaai

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥१३॥

Sahas badan tumharo jas gaavaiAs kahi Shripati kanth lagaavai

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

Sanakaadik Brahmaadi muneesaNaarad Saarad sahit Aheesa

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

Jam Kuber digpaal jahaan teKabi kobid kahi sake kahaan te

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

Tum upkaar Sugreevahi keenhaRam milaay raaj pad deenha

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥१७॥

Tumharo mantra Bibheeshan maanaLankeswar bhaye sab jag jaana

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८॥

Jug sahasra jojan par bhaanuLeelyo taahi madhur phal jaanu

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥१९॥

Prabhu mudrika meli mukh maaheeJaladhi laanghi gaye acharaj naahee

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

Durgam kaaj jagat ke jeteSugam anugrah tumhare tete

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

Ram duaare tum rakhvaareHot na aagya binu paisaare

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥२२॥

Sab sukh lahai tumhaari sarnaTum rachchhak kaahu ko dar naa

एक अन्य पाठ 'सब सुख लहहिं' भी मिलता है।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥२३॥

Aapan tej samhaaro aapaiTeeno lok haank te kaampai

'संहारो' पाठ भी मिलता है। यहाँ 'सम्हारो' का अर्थ अपने तेज को सँभालना है।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥२४॥

Bhoot pisaach nikat nahi aavaiMahabeer jab naam sunaavai

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

Naasai rog harai sab peeraJapat nirantar Hanumat beera

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥

Sankat te Hanuman chhudaavaiMan kram bachan dhyaan jo laavai

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥

Sab par Ram tapasvee raajaTin ke kaaj sakal tum saaja

कहीं कहीं 'राम राय सिरताजा' भी गाया जाता है।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

Aur manorath jo koi laavaiSoi amit jeevan phal paavai

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

Chaaro jug prataap tumhaaraHai parasiddh jagat ujiyaara

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

Saadhu sant ke tum rakhvaareAsur nikandan Ram dulaare

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

Ashta siddhi nau nidhi ke daataAs bar deen Janaki Maata

'अस बर दीन्ह' पाठ भी मिलता है। 'नौ निधि' को 'नव निधि' भी गाते हैं।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

Ram rasaayan tumhare paasaSadaa raho Raghupati ke daasa

एक अन्य पाठ 'सादर हौ' भी मिलता है।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

Tumhare bhajan Ram ko paavaiJanam janam ke dukh bisraavai

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥

Ant kaal Raghubar pur jaaiJahaan janma Haribhakt kahaai

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई॥३५॥

Aur devta chitt na dharaiHanumat sei sarb sukh karai

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

Sankat katai mitai sab peeraJo sumirai Hanumat balbeera

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥३७॥

Jai jai jai Hanuman GosaaiKripa karahu Gurudev ki naai

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

Jo sat baar paath kar koiChhootahi bandi maha sukh hoi

कहीं कहीं 'छूटहिं बंदि' या 'छूटै बंदि' भी गाया जाता है।

जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥

Jo yah padhai Hanuman ChaleesaHoy siddhi saakhi Gaureesa

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥४०॥

Tulsidas sadaa Hari cheraKeejai Naath hriday mah dera

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

Pawantanay sankat haran, mangal moorati roopRam Lakhan Sita sahit, hriday basahu sur bhoop

पदों का अर्थ

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

गुरु के चरणकमलों की धूल से मैं अपने मन का दर्पण साफ करता हूँ। फिर श्री राम के निर्मल यश का गान करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार फल देने वाला है।

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

अपनी समझ की कमी जानकर मैं पवनपुत्र हनुमानजी का स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए, मेरे दुख और मन के दोष दूर कीजिए।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

ज्ञान और गुणों के सागर हनुमानजी की जय हो। तीनों लोकों में प्रसिद्ध वानरों के स्वामी की जय हो।

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥२॥

आप श्री राम के दूत और अपार बल के धाम हैं। आप माता अंजनी के पुत्र और पवनपुत्र के नाम से जाने जाते हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

आप महान वीर हैं, बड़े पराक्रमी हैं और आपका शरीर वज्र जैसा बलवान है। आप बुरी बुद्धि दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥

आपका सुनहरा शरीर सुंदर वेश से सजा है। कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥५॥

आपके हाथों में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं। कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥६॥

चालीसा आपको भगवान शिव का पुत्र और केसरीनंदन कहती है। भक्ति परंपरा में आपको शिव का अंश माना जाता है। आपके तेज और प्रताप को संसार प्रणाम करता है।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥७॥

आप विद्वान, गुणवान और बहुत समझदार हैं। श्री राम का काम करने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥८॥

आपको प्रभु की कथा सुनने में बड़ा आनंद आता है। आपके मन में श्री राम, लक्ष्मणजी और माता सीता बसे हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥

आपने छोटा रूप धरकर माता सीता को दर्शन दिए। फिर भयानक रूप धरकर लंका जलाई।

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥

आपने विशाल और बलवान रूप धरकर राक्षसों का संहार किया। श्री राम के काम पूरे किए।

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥११॥

आप जीवन बचाने वाली औषधि लाए और लक्ष्मणजी को फिर जीवन मिला। श्री राम ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥

श्री राम ने आपकी बहुत प्रशंसा की। उन्होंने आपको अपना भाई कहा, जो उन्हें भरतजी के समान प्रिय है।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥१३॥

श्री राम ने कहा कि हजार मुख वाले शेषजी भी आपका यश गाते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने आपको गले लगा लिया।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥

सनक आदि ऋषि, ब्रह्माजी और बड़े मुनि, नारदजी, माता सरस्वती और शेषजी, सभी आपका यश गाते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥१५॥

यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक भी आपके यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते। कवि और विद्वान भी उसका थोड़ा ही वर्णन कर पाते हैं।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥

आपने सुग्रीवजी को श्री राम से मिलाकर उनका उपकार किया। इसी मित्रता से उन्हें फिर राजपद मिला।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥१७॥

विभीषणजी ने आपकी सलाह मानी। वे लंका के राजा बने, यह बात संसार जानता है।

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८॥

चालीसा बाद की भक्ति परंपरा की वह बाललीला याद करती है जिसमें आपने दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझकर निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥१९॥

श्री राम की अँगूठी मुख में रखकर आप समुद्र पार कर गए। आपके लिए यह आश्चर्य की बात नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥

इस चौपाई में भक्त विश्वास व्यक्त करता है कि आपकी कृपा से संसार के कठिन काम भी सरल हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

आप श्री राम के द्वार के रक्षक हैं। आपकी आज्ञा के बिना कोई भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥२२॥

भक्त को भरोसा है कि आपकी शरण में सब सुख मिलते हैं और आपके रक्षक होने पर किसी का डर नहीं रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥२३॥

अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं। आपकी हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥२४॥

यह चौपाई कहती है कि जब महावीर हनुमानजी का नाम सुनाया जाता है, तब भूत और पिशाच पास नहीं आते।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥

यह चौपाई वीर हनुमानजी के निरंतर नामजप को रोग और पीड़ा से राहत देने वाला बताती है। इसमें उनकी करुणा पर भक्त का विश्वास व्यक्त होता है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥

यह चौपाई विश्वास व्यक्त करती है कि मन, कर्म और वचन से हनुमानजी का ध्यान करने वाले को वे संकट से छुड़ाते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥

तपस्वी राजा श्री राम सबसे ऊपर हैं। उनके सारे काम आप पूरे करते हैं।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥

चालीसा में यह विश्वास व्यक्त होता है कि जो आपके पास मन की इच्छा लेकर आता है, उसे जीवन में भरपूर फल मिलते हैं।

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥

चारों युगों में आपका प्रताप बना रहता है। आपका यश संसार को उजाला देता है।

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥

आप साधुओं और संतों की रक्षा करते हैं। आप राक्षसों का नाश करने वाले और श्री राम के दुलारे हैं।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

चालीसा आपको माता सीता के वरदान से आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाला कहती है। यह विशेष वरदान भक्ति परंपरा में आता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥

आपके पास श्री राम की भक्ति का अमृत है। आप सदा उनके सेवक बने रहते हैं।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥

आपका भजन करने से श्री राम मिलते हैं। जन्मों से चले आ रहे दुख दूर हो जाते हैं।

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥

जीवन के अंत में भक्त श्री राम के धाम जाता है। यदि फिर जन्म हो, तो वह भगवान के भक्त के रूप में जाना जाता है।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई॥३५॥

यह चौपाई दूसरे देवताओं पर चित्त लगाए बिना हनुमानजी की सेवा में एकाग्र रहने की बात कहती है। इसमें विश्वास व्यक्त होता है कि उनकी सेवा से सब सुख मिलते हैं।

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥

इस चौपाई में भक्त विश्वास व्यक्त करता है कि बलवान हनुमानजी के स्मरण से संकट और पीड़ा दूर होते हैं।

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥३७॥

स्वामी हनुमानजी की बारंबार जय हो। गुरुदेव की तरह हम पर कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥

चालीसा कहती है कि जो इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूटकर बड़ा सुख पाता है।

जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥

चालीसा कहती है कि जो हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि मिलती है। भगवान शिव को इसका साक्षी कहा गया है।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥४०॥

गोस्वामी तुलसीदास अपने को सदा भगवान का सेवक कहते हैं। वे हनुमानजी से प्रार्थना करते हैं कि आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

पवनपुत्र हनुमानजी, आप संकट हरने वाले और मंगलमय स्वरूप हैं। श्री राम, लक्ष्मणजी और माता सीता के साथ मेरे हृदय में बसिए।

इस रचना के बारे में

आरंभ की प्रार्थना में बल, बुद्धि और विद्या माँगी गई है, साथ ही दुख और मन के दोष दूर करने की विनती है। अंत में हनुमानजी से हृदय में बसने की प्रार्थना है। इनके बीच भक्त सीधे उनसे बात करते हुए उनका गुणगान करता है। चालीसवीं चौपाई में तुलसीदास स्वयं को भगवान का सेवक कहते हैं। रचना के बारे में परंपरागत मान्यता यही है कि यह गोस्वामी तुलसीदास की है।

इसके पीछे की कथा

किष्किन्धाकाण्ड के दोहा 4 में हनुमानजी अग्नि को साक्षी बनाकर सुग्रीवजी और श्री राम की मित्रता कराते हैं। सुन्दरकाण्ड में दोहा 7 से पहले वे विभीषणजी को श्री राम के सेवक प्रेम का भरोसा देते हैं। दोहा 16 से पहले माता सीता को अपना विशाल रूप दिखाते हैं, फिर छोटा रूप धर लेते हैं। दोहा 26 से पहले लंका दहन का वर्णन है। दोहा 49 से पहले श्री राम विभीषणजी का राजतिलक करते हैं। लंकाकाण्ड में दोहा 58 से पहले औषधि न पहचान पाने पर हनुमानजी पर्वत उठा लेते हैं। दोहा 62 से पहले श्री राम उन्हें गले लगाते हैं। फिर सुषेण के उपचार से लक्ष्मणजी प्रसन्न होकर उठ बैठते हैं।

यह रचना क्या सिखाती है

हनुमानजी सिखाते हैं कि अपनी योग्यता किसी के काम में लगाएँ। बल का भी उद्देश्य है। तीसरी चौपाई में सुमति का अर्थ अच्छी समझ है। यही समझ हमें अभिमान या क्रोध में बहने से पहले सही काम चुनना सिखाती है।

मान लीजिए, पड़ोसी कोई फॉर्म भरने में मदद माँगते हैं। हमें वह भरना आता है, पर वे धीरे पढ़ते हैं और एक बात दो बार पूछते हैं। हम जल्दी से फॉर्म भर सकते हैं। उनके समझने तक पास बैठना धैर्य माँगता है। इसी तरह सेवा में काम के साथ व्यक्ति का ध्यान रखना होता है।

लंका जलाने के बाद हनुमानजी कहते हैं: “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥५॥” (रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा 33 से पहले की चौपाई)। वे अपने काम का श्रेय श्री राम को देते हैं। आज एक चौपाई धीरे पढ़ें, उसका अर्थ समझें और बिना प्रशंसा चाहे किसी का एक काम कर दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमान चालीसा का अर्थ क्या है?

चालीसा नाम इसकी चालीस चौपाइयों से जुड़ा है। इसमें हनुमानजी के ज्ञान, बल और श्री राम के प्रति भक्ति का गुणगान है, साथ ही उनकी कृपा की प्रार्थना है। आरंभ में दो दोहे और अंत में एक दोहा है।

हनुमान चालीसा किसने लिखी?

परंपरा हनुमान चालीसा को गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है। यह स्वतंत्र रचना है, रामचरितमानस का भाग नहीं है।

हनुमान चालीसा कब पढ़ सकते हैं?

ऐसा शांत समय चुन सकते हैं जब शब्दों और उनके अर्थ पर ध्यान दे सकें। चालीसा में किसी खास दिन या घड़ी का निर्देश नहीं है। रोज का एक समय रखने से ध्यानपूर्वक पाठ करने की आदत बन सकती है।

हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्त साहस, अच्छी बुद्धि और संकट में सहारे के लिए हनुमानजी का स्मरण करते हैं। दुख दूर करने की प्रार्थनाएँ उनकी कृपा पर भरोसा व्यक्त करती हैं। पाठ के साथ अर्थ पर मनन और सेवा करें, इसे स्वास्थ्य, धन या किसी खास परिणाम की गारंटी न मानें।

क्या हनुमान चालीसा की कथाएँ रामचरितमानस से हैं?

कई प्रसंग मानस की याद दिलाते हैं। सुग्रीवजी और श्री राम की मित्रता किष्किन्धाकाण्ड में है। माता सीता से भेंट और लंका दहन सुन्दरकाण्ड में हैं। लक्ष्मणजी के स्वस्थ होने का प्रसंग लंकाकाण्ड में है। सूर्य निगलने की कथा बाद की भक्ति परंपरा में आती है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 66, श्लोक 21 और 22 में बाल हनुमानजी सूर्य को फल समझकर उसकी ओर छलाँग लगाते हैं। वहाँ सूर्य निगलने का वर्णन नहीं है। चालीसा के अपने शब्द हैं, हर पंक्ति को मानस का उद्धरण नहीं समझना चाहिए।

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