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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 98"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 98

> महोदरे तु निहते महापार्श्वो महाबलः।  
> सुग्रीवेण समीक्ष्याथ क्रोधात् संरक्तलोचनः ॥ १ ॥

सुग्रीवके द्वारा महोदरके मारे जानेपर उनकी ओर देखकर महाबली महापार्श्वके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये ॥ १ ॥

> अङ्गदस्य चमूं भीमां क्षोभयामास मार्गणैः।  
> स वानराणां मुख्यानामुत्तमाङ्गानि राक्षसः ॥ २ ॥  
> पातयामास कायेभ्यः फलं वृन्तादिवानिलः ।

उसने अपने बाणोंद्वारा अंगदकी भयंकर सेनामें हलचल मचा दी । वह राक्षस मुख्य-मुख्य वानरोंके मस्तक धड़से काट-काटकर गिराने लगा, मानो वायु वृन्त या डंठलसे फल गिरा रही हो ॥ २½ ॥

> केषांचिदिषुभिर्बाहूंश्चिच्छेदाथ स राक्षसः ॥ ३ ॥  
> वानराणां सुसंरब्धः पार्श्वं केषांचिदाक्षिपत् ।

क्रोधसे भरे हुए महापार्श्वने अपने बाणोंसे कितनोंकी बाँहें काट दीं और कितने ही वानरोंकी पसलियाँ उड़ा दीं॥३½॥

> तेऽर्दिता बाणवर्षेण महापार्श्वेन वानराः ॥ ४ ॥  
> विषादविमुखाः सर्वे बभूवुर्गतचेतसः ।

महापार्श्वकी बाणवर्षासे पीड़ित हो बहुत-से वानर युद्धसे विमुख हो गये । सबकी चेतना जाती रही ॥ ४½ ॥

> निशाम्य बलमुद्विग्नमङ्गदो राक्षसार्दितम् ॥ ५ ॥  
> वेगं चक्रे महावेगः समुद्र इव पर्वसु ।

उस राक्षससे पीड़ित वानर-सेनाको उद्विग्न हुई देख महान् वेगशाली अङ्गदने पूर्णिमाके दिन समुद्रकी भाँति अपना भारी वेग प्रकट किया ॥ ५½ ॥

> आयसं परिघं गृह्य सूर्यरश्मिसमप्रभम् ॥ ६ ॥  
> समरे वानरश्रेष्ठो महापार्श्वे न्यपातयत् ।

उन वानरशिरोमणिने सूर्यकी किरणोंके समान दमकने-वाला एक लोहेका परिघ उठाकर महापार्श्वपर दे मारा ॥६½॥

> स तु तेन प्रहारेण महापार्श्वो विचेतनः ॥ ७ ॥  
> ससूतः स्यन्दनात् तस्माद् विसंज्ञश्चापतद् भुवि ।

उस प्रहारसे महापार्श्वकी सुध-बुध जाती रही और वह मूर्छित हो सारथिसहित रथसे नीचे जा पड़ा ॥ ७½ ॥

> तस्यर्क्षराजस्तेजस्वी नीलाञ्जनचयोपमः ॥ ८ ॥  
> निष्पत्य सुमहावीर्यः स्वयूथान्मेघसंनिभात् ।  
> प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभां क्रुद्धः स विपुलां शिलाम् ॥ ९ ॥  
> अश्वाञ्जघान तरसा बभञ्ज स्यन्दनं च तम् ।

इसी समय काले कोयलेके ढेरके समान कृष्ण वर्णवाले, महान् पराक्रमी और तेजस्वी ऋक्षराज जाम्बवान्ने मेघोंकी घटाके सदृश अपने यूथसे बाहर निकलकर कुपित हो एक पर्वतशिखरके समान विशाल शिला हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस राक्षसके घोड़ोंको मार डाला तथा उसके रथको भी चूर्ण कर दिया ॥ ८-९½ ॥

> मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु महापार्श्वो महाबलः ॥ १० ॥  
> अङ्गदं बहुभिर्बाणैर्भूयस्तं प्रत्यविध्यत ।  
> जाम्बवन्तं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ ११ ॥

दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर महाबली महापार्श्वने बहुत-से बाणोंद्वारा पुनः अङ्गदको घायल कर दिया और जाम्बवान्की छातीमें भी तीन बाण मारे ॥ १०-११ ॥

> ऋक्षराजं गवाक्षं च जघान बहुभिः शरैः।  
> गवाक्षं जाम्बवन्तं च स दृष्ट्वा शरपीडितौ ॥ १२ ॥  
> जग्राह परिघं घोरमङ्गदः क्रोधमूर्च्छितः ।

इतना ही नहीं, उसने रीछोंके राजा गवाक्षको भी बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया । गवाक्ष और जाम्बवान्को बाणोंसे पीड़ित देख अङ्गदके क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने भयंकर परिघ हाथमें ले लिया ॥ १२½ ॥

> तस्याङ्गदः सरोषाक्षो राक्षसस्य तमायसम् ॥ १३ ॥  
> दूरस्थितस्य परिघं रविरश्मिसमप्रभम् ।  
> द्वाभ्यां भुजाभ्यां संगृह्य भ्रामयित्वा च वेगवत्॥ १४ ॥  
> महापार्श्वस्य चिक्षेप वधार्थं वालिनः सुतः ।

उनका वह परिघ सूर्यकी किरणोंके समान अपनी प्रभा बिखेर रहा था । वालिपुत्र अङ्गदके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे थे । उन्होंने उस लोहमय परिघको दोनों हाथोंसे पकड़कर घुमाया और दूर खड़े हुए महापार्श्वके वधके लिये वेगपूर्वक चला दिया ॥ १३-१४½ ॥

> स तु क्षिप्तो बलवता परिघस्तस्य रक्षसः ॥ १५ ॥  
> धनुश्च सशरं हस्ताच्छिरस्त्राणं च पातयत् ।

बलवान् वीर अङ्गदके चलाये हुए उस परिघने राक्षस महापार्श्वके हाथसे बाणसहित धनुष और मस्तकसे टोप गिरा दिये ॥ १५½ ॥

> तं समासाद्य वेगेन वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ १६ ॥  
> तलेनाभ्यहनत् क्रुद्धः कर्णमूले सकुण्डले ।

फिर प्रतापी वालिपुत्र अङ्गद बड़े वेगसे उसके पास-जा पहुँचे और कुपित होकर उन्होंने उसके कुण्डलयुक्त कानके पास गालमें एक थप्पड़ मारा ॥ १६½ ॥

> स तु क्रुद्धो महावेगो महापार्श्वो महाद्युतिः ॥ १७ ॥  
> करेणैकेन जग्राह सुमहान्तं परश्वधम् ।

तब महान् वेगशाली महातेजस्वी महापार्श्वने कुपित होकर एक हाथमें बहुत बड़ा फरसा ले लिया ॥ १७½ ॥

> तं तैलधौतं विमलं शैलसारमयं दृढम् ॥ १८ ॥  
> राक्षसः परमक्रुद्धो वालिपुत्रे न्यपातयत् ।

उस फरसेको तेलमें डुबोकर साफ किया गया था और वह अच्छे लोहेका बना हुआ एवं सुदृढ़ था । राक्षस महापार्श्वने अत्यन्त कुपित हो वह फरसा वालिपुत्र अङ्गदपर दे मारा॥१८½॥

> तेन वामांसफलके भृशं प्रत्यवपातितम् ॥ १९ ॥  
> अङ्गदो मोक्षयामास सरोषः स परश्वधम् ।

उसने अङ्गदके बायें कंधेपर बड़े वेगसे उस फरसेका प्रहार किया था, परंतु रोषसे भरे हुए अङ्गदने कतराकर अपनेको बचा लिया और उस फरसेको व्यर्थ कर दिया॥१९½॥

> स वीरो वज्रसंकाशमङ्गदो मुष्टिमात्मनः ॥ २० ॥  
> संवर्तयत् सुसंकृद्धः पितुस्तुल्यपराक्रमः ।

तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वीर अङ्गदने, जो अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे, वज्रके समान मुट्ठी बाँधी ॥ २०½ ॥

> राक्षसस्य स्तनाभ्याशे मर्मज्ञो हृदयं प्रति ॥ २१ ॥  
> इन्द्राशनिसमस्पर्शं स मुष्टिं विन्यपातयत् ।

वे हृदयके मर्मस्थानसे परिचित थे; अतः उन्होंने उस राक्षसके स्तनोंके निकट छातीमें बड़े वेगसे मुक्का मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान असह्य था ॥ २१½ ॥

> तेन तस्य निपातेन राक्षसस्य महामृधे ॥ २२ ॥  
> पफाल हृदयं चास्य स पपात हतो भुवि ।

उनका वह घूसा लगते ही उस महासमरमें राक्षस महापार्श्वका हृदय फट गया और वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२½ ॥

> तस्मिन् विनिहते भूमौ तत् सैन्यं सम्प्रचुक्षुभे ॥ २३ ॥  
> अभवच्च महान् क्रोधः समरे रावणस्य तु ।

उसके मरकर पृथ्वीपर गिर जानेके पश्चात् उसकी सेना विक्षुब्ध हो उठी तथा समरभूमिमें रावणको भी महान् क्रोध हुआ ॥ २३½ ॥

> वानराणां प्रहृष्टानां सिंहनादः सुपुष्कलः ॥ २४ ॥  
> स्फोटयन्निव शब्देन लङ्कां साट्टालगोपुराम् ।  
> सहेन्द्रेणेव देवानां नादः समभवन्महान् ॥ २५ ॥

उस समय हर्षसे भरे हुए वानरोंका महान् सिंहनाद होने लगा । वह अट्टालिकाओं तथा गोपुरोंसहित लङ्कापुरीको फोड़ता हुआ-सा प्रतीत हुआ । अङ्गदसहित वानरोंका वह महानाद इन्द्रसहित देवताओंके गम्भीर घोष-सा जान पड़ता था ॥ २४-२५ ॥

> अथेन्द्रशत्रुस्त्रिदशालयानां  
> वनौकसां चैव महाप्रणादम् ।  
> श्रुत्वा सरोषं युधि राक्षसेन्द्रः  
> पुनश्च युद्धाभिमुखोऽवतस्थे ॥ २६ ॥

युद्धस्थलमें देवताओं और वानरोंकी वह बड़ी भारी गर्जना सुनकर इन्द्रद्रोही राक्षसराज रावण पुनः रोषपूर्वक युद्धके लिये उत्सुक हो वहाँ खड़ा हो गया ॥ २६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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