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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 83"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 83

> राघवश्चापि विपुलं तं राक्षसवनौकसाम् ।  
> श्रुत्वा संग्रामनिर्घोषं जाम्बवन्तमुवाच ह॥ १ ॥

भगवान् श्रीरामने भी राक्षसों और वानरोंके उस महान् युद्धघोषको सुनकर जाम्बवान्से कहा—॥ १ ॥

> सौम्य नूनं हनुमता कृतं कर्म सुदुष्करम् ।  
> श्रूयते च यथा भीमः सुमहानायुधस्वनः ॥ २ ॥

‘सौम्य ! निश्चय ही हनुमान्जीने अत्यन्त दुष्कर कर्म आरम्भ किया है; क्योंकि उनके आयुधोंका यह महाभयंकर शब्द स्पष्ट सुनायी पड़ता है ॥ २ ॥

> तद् गच्छ कुरु साहाय्यं स्वबलेनाभिसंवृतः ।  
> क्षिप्रमृक्षपते तस्य कपिश्रेष्ठस्य युध्यतः ॥ ३ ॥

‘अतः ऋक्षराज ! तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र जाओ और जूझते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्की सहायता करो’ ॥ ३ ॥

> ऋक्षराजस्तथेत्युक्त्वा स्वेनानीकेन संवृतः ।  
> आगच्छत् पश्चिमं द्वारं हनूमान् यत्र वानरः ॥ ४ ॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर अपनी सेनासे घिरे हुए ऋक्षराज जाम्बवान् लङ्काके पश्चिम द्वारपर, जहाँ वानरवीर हनुमान्जी विराजमान थे, आये ॥ ४ ॥

> अथायान्तं हनूमन्तं ददर्शर्क्षपतिस्तदा ।  
> वानरैः कृतसंग्रामैः श्वसद्भिरभिसंवृतम् ॥ ५ ॥

वहाँ ऋक्षराजने युद्ध करके लौटे और लंबी साँस खींचते हुए वानरोंके साथ हनुमान्जीको आते देखा ॥ ५ ॥

> दृष्ट्वा पथि हनूमांश्च तदृक्षबलमुद्यतम् ।  
> नीलमेघनिभं भीमं संनिवार्य न्यवर्तत ॥ ६ ॥

हनुमान्जीने भी मार्गमें नील मेघके समान भयंकर ऋक्ष-सेनाको युद्धके लिये उद्यत देख उसे रोका और सबके साथ ही वे लौट आये ॥ ६ ॥

> स तेन सह सैन्येन संनिकर्षं महायशाः ।  
> शीघ्रमागम्य रामाय दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥

महायशस्वी हनुमान्जी उस सेनाके साथ शीघ्र भगवान् श्रीरामके निकट आये और दुखी होकर बोले—॥ ७ ॥

> समरे युध्यमानानामस्माकं प्रेक्षतां च सः ।  
> जघान रुदतीं सीतामिन्द्रजिद् रावणात्मजः ॥ ८ ॥

‘प्रभो ! हमलोग युद्ध करनेमें लगे थे, उसी समय समरभूमिमें रावणपुत्र इन्द्रजित्ने हमारे देखते-देखते रोती हुई सीताको मार डाला है ॥ ८ ॥

> उद्भ्रान्तचित्तस्तां दृष्ट्वा विषण्णोऽहमरिंदम ।  
> तदहं भवतो वृत्तं विज्ञापयितुमागतः ॥ ९ ॥

‘शत्रुदमन ! उन्हें उस अवस्थामें देख मेरा चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है । मैं विषादमें डूब गया हूँ । इसलिये मैं आपको यह समाचार बतानेके लिये आया हूँ’ ॥ ९ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूर्च्छितः ।  
> निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १० ॥

हनुमान्जीकी यह बात सुनकर श्रीरामजी उस समय शोकसे मूर्च्छित हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १० ॥

> तं भूमौ देवसंकाशं पतितं दृश्य राघवम् ।  
> अभिपेतुः समुत्पत्य सर्वतः कपिसत्तमाः ॥ ११ ॥

देवतुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीको भूमिपर पड़ा देख समस्त श्रेष्ठ वानर सब ओरसे उछलकर वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥

> आसिञ्चन् सलिलैश्चैनं पद्मोत्पलसुगन्धिभिः ।  
> प्रदहन्तमसंहार्यं सहसाग्निमिवोत्थितम् ॥ १२ ॥

वे कमल और उत्पलकी सुगन्धसे युक्त जल ले आकर उनके ऊपर छिड़कने लगे । उस समय वे सहसा प्रज्वलित होकर दहन-कर्म करनेवाली और बुझायी न जा सकनेवाली अग्निके समान दिखायी देते थे ॥ १२ ॥

> तं लक्ष्मणोऽथ बाहुभ्यां परिष्वज्य सुदुःखितः ।  
> उवाच राममस्वस्थं वाक्यं हेत्वर्थसंयुतम् ॥ १३ ॥

भाईकी यह अवस्था देखकर लक्ष्मणको बड़ा दुःख हुआ । वे उन्हें दोनों भुजाओंमें भरकर बैठ गये और अस्वस्थ हुए श्रीरामसे यह युक्तियुक्त एवं प्रयोजनभरी बात बोले—॥१३॥

> शुभे वर्त्मनि तिष्ठन्तं त्वामार्य विजितेन्द्रियम् ।  
> अनर्थेभ्यो न शक्नोति त्रातुं धर्मो निरर्थकः ॥ १४ ॥

‘आर्य ! आप सदा शुभ मार्गपर स्थिर रहनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, तथापि धर्म आपको अनर्थोंसे बचा नहीं पाता है । इसलिये वह निरर्थक ही जान पड़ता है ॥ १४ ॥

> भूतानां स्थावराणां च जङ्गमानां च दर्शनम् ।  
> यथास्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः ॥ १५ ॥

‘स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्म कारण नहीं है ( क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्ममें उनका अधिकार ही है ) । अतः धर्म सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है ॥ १५ ॥

> यथैव स्थावरं व्यक्तं जङ्गमं च तथाविधम् ।  
> नायमर्थस्तथा युक्तस्त्वद्विधो न विपद्यते ॥ १६ ॥

‘जैसे स्थावर भूत धर्माधिकारी न होनेपर भी सुखी देखा जाता है, उसी प्रकार जङ्गम प्राणी ( पशु आदि ) भी सुखी है, यह बात स्पष्ट ही समझमें आती है । यदि कहें जहाँ धर्म है, वहाँ सुख अवश्य है तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उस दशामें आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषको विपत्तिमें नहीं पड़ना चाहिये ॥ १६ ॥

> यद्यधर्मो भवेद् भूतो रावणो नरकं व्रजेत् ।  
> भवांश्च धर्मसंयुक्तो नैव व्यसनमाप्नुयात् ॥ १७ ॥

‘यदि अधर्मकी भी सत्ता होती अर्थात् अधर्म अवश्य ही दुःखका साधन होता तो रावणको नरकमें पड़े रहना चाहिये था और आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषपर संकट नहीं आना चाहिये था ॥ १७ ॥

> तस्य च व्यसनाभावाद् व्यसनं चागते त्वयि ।  
> धर्मो भवत्यधर्मश्च परस्परविरोधिनौ ॥ १८ ॥

‘रावणपर तो कोई संकट नहीं है और आप संकटमें पड़ गये हैं; अतः धर्म और अधर्म दोनों परस्परविरोधी हो गये हैं—धर्मात्माको दुःख और पापात्माको सुख मिलने लगा है ॥ १८ ॥

> धर्मेणोपलभेद् धर्ममधर्मं चाप्यधर्मतः ।  
> यद्यधर्मेण युज्येयुर्येष्वधर्मः प्रतिष्ठितः ॥ १९ ॥  
> न धर्मेण वियुज्येरन्नाधर्मरुचयो जनाः ।  
> धर्मेणाचरतां तेषां तथा धर्मफलं भवेत् ॥ २० ॥

‘यदि धर्मसे धर्मका फल ( सुख ) और अधर्मसे अधर्मका फल ( दुःख ) ही मिलनेका नियम होता तो जिन रावण आदिमें अधर्म ही प्रतिष्ठित है, वे अधर्मके फलभूत दुःखसे ही युक्त होते और जो लोग अधर्ममें रुचि नहीं रखते हैं, वे धर्मसे—धर्मके फलभूत सुखसे कभी वञ्चित न होते । धर्ममार्गसे चलनेवाले इन धर्मात्मा पुरुषोंको केवल धर्मका फल— सुख ही प्राप्त होता ॥ १९-२० ॥

> यस्मादर्था विवर्धन्ते येष्वधर्मः प्रतिष्ठितः ।  
> क्लिश्यन्ते धर्मशीलाश्च तस्मादेतौ निरर्थकौ ॥ २१ ॥

‘किंतु जिनमें अधर्म प्रतिष्ठित है, उनके तो धन बढ़ रहे हैं और जो स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले हैं, वे क्लेशमें पड़े हुए हैं । इसलिये ये धर्म और अधर्म—दोनों निरर्थक हैं ॥ २१ ॥

> वध्यन्ते पापकर्माणो यद्यधर्मेण राघव ।  
> वधकर्महतोऽधर्मः स हतः कं वधिष्यति ॥ २२ ॥

‘रघुनन्दन ! यदि पापाचारी पुरुष धर्म या अधर्मसे मारे जाते हैं तो धर्म या अधर्म क्रियारूप होनेके कारण ( आदि, मध्य और अन्त ) तीन ही क्षणोंतक रह सकता है । चतुर्थ क्षणमें तो वह स्वयं ही नष्ट हो जायगा; फिर नष्ट हुआ वह धर्म या अधर्म किसका वध करेगा ? ॥ २२ ॥

> अथवा विहितेनायं हन्यते हन्ति चापरम् ।  
> विधिः स लिप्यते तेन न स पापेन कर्मणा ॥ २३ ॥

‘अथवा यह जीव यदि विधिपूर्वक किये गये कर्मविशेष ( श्येनयाग आदि ) के द्वारा मारा जाता है या स्वयं वैसा कर्म करके दूसरेको मारता है तो विधि ( विहित कर्मजनित अदृष्ट ) को ही हत्याके दोषसे लिप्त होना चाहिये, कर्मका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका उस पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं होना चाहिये ( क्योंकि पुत्रके किये हुए अपराधका दण्ड पिताको नहीं मिलता है ) ॥ २३ ॥

> अदृष्टप्रतिकारेण अव्यक्तेनासता सता ।  
> कथं शक्यं परं प्राप्तुं धर्मेणारिविकर्षण ॥ २४ ॥

‘शत्रुसूदन ! जो चेतन न होनेके कारण प्रतीकार-ज्ञानसे शून्य है, अव्यक्त है और असत्के समान विद्यमान है, उस धर्मके द्वारा दूसरे ( पापात्मा ) को वध्यरूपसे प्राप्त करना कैसे सम्भव है ? ॥ २४ ॥

> यदि सत् स्यात् सतां मुख्य नासत् स्यात् तव किंचन ।  
> त्वया यदीदृशं प्राप्तं तस्मात् तन्नोपपद्यते ॥ २५ ॥  
> अथवा दुर्बलः क्लीबो बलं धर्मोऽनुवर्तते ।  
> दुर्बलो हतमर्यादो न सेव्य इति मे मतिः ॥ २६ ॥

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ रघुवीर ! यदि सत्कर्मजनित अदृष्ट सत् या शुभ ही होता तो आपको कुछ भी अशुभ या दुःख नहीं प्राप्त होता । यदि आपको ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है तो सत्कर्मजनित अदृष्ट सत् ही है, इस कथनकी संगति नहीं बैठती* ॥ ‘यदि दुर्बल और कातर ( स्वतः कार्य-साधनमें असमर्थ ) होनेके कारण धर्म पुरुषार्थका अनुसरण करता है, तब तो दुर्बल और फलदानकी मर्यादासे रहित धर्मका सेवन ही नहीं करना चाहिये—यह मेरी स्पष्ट राय है ॥ २६ ॥

> बलस्य यदि चेद् धर्मों गुणभूतः पराक्रमैः ।  
> धर्ममुत्सृज्य वर्तस्व यथा धर्मे तथा बले ॥ २७ ॥

‘यदि धर्म बल अथवा पुरुषार्थका अङ्ग या उपकरण-मात्र है तो धर्मको छोड़कर पराक्रमपूर्ण बर्ताव कीजिये । जैसे आप धर्मको प्रधान मानकर धर्ममें लगे हैं, उसी प्रकार बलको प्रधान मानकर बल या पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होइये ॥ २७ ॥

> अथ चेत् सत्यवचनं धर्मः किल परंतप ।  
> अनृतं त्वय्यकरणे किं न बद्धस्त्वया विना ॥ २८ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन ! यदि आप सत्य-भाषणरूप धर्मका पालन करते हैं अर्थात् पिताकी आज्ञाको स्वीकार करके उनके सत्यकी रक्षारूप धर्मका अनुष्ठान करते हैं तो आप ज्येष्ठ पुत्रके प्रति युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी जो बात पिताने कही थी, उस सत्यका पालन न करनेपर पिताको जो असत्यरूप अधर्म प्राप्त हुआ, उसीके कारण वे आपसे बियुक्त होकर मर गये । ऐसी दशामें क्या आप राजाके पहले कहे हुए अभिषेक-सम्बन्धी सत्य वचनसे नहीं बँधे हुए थे ? उस सत्यका पालन करनेके लिये बाध्य नहीं थे ( यदि आपने पिताके पहले कहे हुए वचनका ही पालन करके युवराजपदपर अपना अभिषेक करा लिया होता तो न पिताकी मृत्यु हुई होती और न सीता-हरण आदि अनर्थ ही संघटित हुए होते ) ॥ २८ ॥

> यदि धर्मों भवेद् भूत अधर्मो वा परंतप ।  
> न स्म हत्वा मुनिं वज्री कुर्यादिज्यां शतक्रतुः ॥ २९ ॥

‘शत्रुदमन महाराज ! यदि केवल धर्म अथवा अधर्म ही प्रधानरूपसे अनुष्ठानके योग्य होता तो वज्रधारी इन्द्र पौरुष-द्वारा विश्वरूप मुनिकी हत्या ( अधर्म ) करके फिर यज्ञ (धर्म) का अनुष्ठान नहीं करते ॥ २९ ॥

> अधर्मसंश्रितो धर्मो विनाशयति राघव ।  
> सर्वमेतद् यथाकामं काकुत्स्थ कुरुते नरः ॥ ३० ॥

‘रघुनन्दन ! धर्मसे भिन्न जो पुरुषार्थ है, उससे मिला हुआ धर्म ही शत्रुओंका नाश करता है । अतः काकुत्स्थ ! प्रत्येक मनुष्य आवश्यकता एवं रुचिके अनुसार इन सबका ( धर्म एवं पुरुषार्थका ) अनुष्ठान करता है ॥ ३० ॥

> मम चेदं मतं तात धर्मोऽयमिति राघव ।  
> धर्ममूलं त्वया छिन्नं राज्यमुत्सृजता तदा ॥ ३१ ॥

‘तात राघव ! इस प्रकार समयानुसार धर्म एवं पुरुषार्थ-मेंसे किसी एकका आश्रय लेना धर्म ही है; ऐसा मेरा मत है । आपने उस दिन राज्यका त्याग करके धर्मके मूलभूत अर्थका उच्छेद कर डाला ॥ ३१ ॥

> अर्थेभ्योऽथ प्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।  
> क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ३२ ॥

‘जैसे पर्वतोंसे नदियाँ निकलती हैं, उसी तरह जहाँ-तहाँसे संग्रह करके लाये और बढ़े हुए अर्थसे सारी क्रियाएँ ( चाहे वे योगप्रधान हों या भोगप्रधान ) सम्पन्न होती हैं ( निष्काम भाव होनेपर सभी क्रियाएँ योगप्रधान हो जाती हैं और सकाम भाव होनेपर भोगप्रधान ) ॥ ३२ ॥

> अर्थेन हि विमुक्तस्य पुरुषस्याल्पचेतसः ।  
> विच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ ३३ ॥

‘जो मन्दबुद्धि मानव अर्थसे वञ्चित है, उसकी सारी क्रियाएँ उसी तरह छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जैसे ग्रीष्म ऋतुमें छोटी-छोटी नदियाँ सूख जाती हैं ॥ ३३ ॥

> सोऽयमर्थं परित्यज्य सुखकामः सुखैधितः ।  
> पापमाचरते कर्तुं तदा दोषः प्रवर्तते ॥ ३४ ॥

‘जो पुरुष सुखमें पला हुआ है, वह यदि प्राप्त हुए अर्थको त्यागकर सुख चाहता है तो उस अभीष्ट सुखके लिये अन्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करनेमें प्रवृत्त होता है; इसलिये उसे ताड़न, बन्धन आदि दोष प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥

> यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।  
> यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३५ ॥

‘जिसके पास धन है, उसीके अधिक मित्र होते हैं । जिसके पास धनका संग्रह है, उसीके सब लोग भाई-बन्धु बनते हैं । जिसके यहाँ पर्याप्त धन है, वही संसारमें श्रेष्ठ पुरुष कहलाता है और जिसके पास धन है, वही विद्वान् समझा जाता है ॥३५॥

> यस्यार्थाः स च विक्रान्तो यस्यार्थाः स च बुद्धिमान् ।  
> यस्यार्थाः स महाभागो यस्यार्थाः स गुणाधिकः ॥३६॥

‘जिसके यहाँ धनराशि एकत्र है, वह पराक्रमी कहा जाता है । जिसके पास धनकी अधिकता है । वह बुद्धिमान् माना जाता है, जिसके यहाँ अर्थसंग्रह है, वह महान् भाग्यशाली कहलाता है तथा जिसके यहाँ धन-सम्पत्ति है, वह गुणोंमें भी बढ़ा-चढ़ा समझा जाता है ॥ ३६ ॥

> अर्थस्यैते परित्यागे दोषाः प्रव्याहृता मया ।  
> राज्यमुत्सृजता धीर येन बुद्धिस्त्वया कृता ॥ ३७ ॥

‘अर्थका त्याग करनेसे जो मित्रका अभाव आदि दोष प्राप्त होते हैं, उनका मैंने स्पष्टरूपसे वर्णन किया है । आपने राज्य छोड़ते समय क्या लाभ सोचकर अपनी बुद्धिमें अर्थ-त्यागकी भावनाको स्थान दिया, यह मैं नहीं जानता ॥ ३७ ॥

> यस्यार्था धर्मकामार्थास्तस्य सर्वे प्रदक्षिणम् ।  
> अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विचिन्वता ॥ ३८ ॥

‘जिसके पास धन है, उसके धर्म और कामरूप सारे प्रयोजन सिद्ध होते हैं । उसके लिये सब कुछ अनुकूल बन जाता है । जो निर्धन है, वह अर्थकी इच्छा रखकर उसका अनुसंधान करनेपर भी पुरुषार्थके बिना उसे नहीं पा सकता ॥ ३८ ॥

> हर्षः कामश्च दर्पश्च धर्मः क्रोधः शमो दमः ।  
> अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ॥ ३९ ॥

‘नरेश्वर ! हर्ष, काम, दर्प, धर्म, क्रोध, शम और दम-ये सब धन होनेसे ही सफल होते हैं ॥ ३९ ॥

> येषां नश्यत्ययं लोकश्चरतां धर्मचारिणाम् ।  
> तेऽर्थास्त्वयि न दृश्यन्ते दुर्दिनेषु यथा ग्रहाः ॥ ४० ॥

‘जो धर्मका आचरण करनेवाले और तपस्यामें लगे हुए हैं, उन पुरुषोंका यह लोक ( ऐहिक पुरुषार्थ ) अर्थाभावके कारण ही नष्ट हो जाता है; यह स्पष्ट देखा जाता है । वही अर्थ इस दुर्दिनमें आपके पास उसी तरह नहीं दिखायी देता है, जैसे आकाशमें बादल घिर आनेपर ग्रहोंके दर्शन नहीं होते हैं ॥ ४० ॥

> त्वयि प्रव्रजिते वीर गुरोश्च वचने स्थिते ।  
> रक्षसापहृता भार्या प्राणैः प्रियतरा तव ॥ ४१ ॥

‘वीर ! आप पूज्य पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये राज्य छोड़कर वनमें चले आये और सत्यके पालनपर ही डटे रहे; परंतु राक्षसने आपकी पत्नीको, जो आपको प्राणोंसे भी अधिक प्यारी थी, हर लिया ॥ ४१ ॥

> तदद्य विपुलं वीर दुःखमिन्द्रजिता कृतम् ।  
> कर्मणा व्यपनेष्यामि तस्मादुत्तिष्ठ राघव ॥ ४२ ॥

‘वीर रघुनन्दन ! आज इन्द्रजित्ने हमलोगोंको जो महान् दुःख दिया है, उसे मैं अपने पराक्रमसे दूर करूँगा; अतः चिन्ता छोड़कर उठिये ॥ ४२ ॥

> उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो धृतव्रत ।  
> किमात्मानं महात्मानमात्मानं नावबुध्यसे ॥ ४३ ॥

‘नरश्रेष्ठ ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाबाहो ! उठिये । आप परम बुद्धिमान् और परमात्मा हैं, इस रूपमें अपने-आपको क्यों नहीं समझ रहे हैं ? ॥ ४३ ॥

> अयमनघ तवोदितः प्रियार्थं  
> जनकसुतानिधनं निरीक्ष्य रुष्टः ।  
> सरथगजहयां सराक्षसेन्द्रां  
> भृशमिषुभिर्विनिपातयामि लङ्काम् ॥ ४४ ॥

‘निष्पाप रघुवीर ! यह मैंने आपसे जो कुछ कहा है, वह सब आपका प्रिय करनेके लिये—आपका ध्यान शोककी ओरसे हटाकर पुरुषार्थकी ओर आकृष्ट करनेके लिये कहा है । अब जनकनन्दिनीकी मृत्युका वृत्तान्त जानकर मेरा रोष बढ़ गया है, अतः आज अपने बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े, रथ और राक्षसराज रावणसहित सारी लङ्काको धूलमें मिला दूँगा’ ॥ ४४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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