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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 74"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 74

> तयोस्तदासादितयो रणाग्रे  
> मुमोह सैन्यं हरियूथपानाम् ।  
> सुग्रीवनीलाङ्गदजाम्बवन्तो  
> न चापि किंचित् प्रतिपेदिरे ते ॥ १ ॥

युद्धके मुहानेपर जब वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चेष्ट होकर पड़ गये, तब वानर-सेनापतियोंकी वह सेना किंकर्तव्यविमूढ हो गयी । सुग्रीव, नील, अंगद और जाम्बवान्को भी उस समय कुछ नहीं सूझता था ॥ १ ॥

> ततो विषण्णं समवेक्ष्य सर्वं  
> विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।  
> उवाच शाखामृगराजवीरा-  
> नाश्वासयन्नप्रतिमैर्वचोभिः ॥ २ ॥

उस समय सबको विषादमें डूबा हुआ देख बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणने वानरराजके उन वीर सैनिकोंको आश्वासन देते हुए अनुपम वाणीमें कहा—॥ २ ॥

> मा भैष्ट नास्त्यत्र विषादकालो  
> यदार्यपुत्रौ हावशौ विषण्णौ ।  
> स्वयंभुवो वाक्यमथोद्वहन्तौ  
> यत्सादिताविन्द्रजिताख्रजालैः ॥ ३ ॥

‘वानर वीरो ! आपलोग भयभीत न हों । यहाँ विषादका अवसर नहीं है; क्योंकि इन दोनों आर्यपुत्रोंने ब्रह्माजीके वचनोंका आदर एवं पालन करते हुए स्वयं ही हथियार नहीं उठाये थे; इसीलिये इन्द्रजित्ने इन दोनोंको अपने अस्त्र-समूहोंसे आच्छादित कर दिया था । अतएव ये दोनों भाई केवल विषादग्रस्त ( मूर्छित ) हो गये हैं ( इनके प्राणोंपर संकट नहीं आया है ) ॥ ३ ॥

> तस्मै तु दत्तं परमास्त्रमेतत्  
> स्वयंभुवा ब्राह्मममोघवीर्यम् ।  
> तन्मानयन्तौ युधि राजपुत्रौ  
> निपातितौ कोऽत्र विषादकालः ॥ ४ ॥

‘स्वयम्भू ब्रह्माजीने यह उत्तम अस्त्र इन्द्रजित्को दिया था । ब्रह्मास्त्रके नामसे इसकी प्रसिद्धि है और इसका बल अमोघ है । संग्राममें उसका समादर—उसकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए ही ये दोनों राजकुमार धराशायी हुए हैं; अतः इसमें खेदकी कौन-सी बात है ?’ ॥ ४ ॥

> ब्राह्ममस्त्रं ततो धीमान् मानयित्वा तु मारुतिः ।  
> विभीषणवचः श्रुत्वा हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

विभीषणकी बात सुनकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने ब्रह्मास्त्रका सम्मान करते हुए उनसे इस प्रकार कहा—॥५॥

> अस्मिन्नस्त्रहते सैन्ये वानराणां तरस्विनाम् ।  
> यो यो धारयते प्राणांस्तं तमाश्वासयावहे ॥ ६ ॥

‘राक्षसराज ! इस अस्त्रसे घायल हुए वेगशाली वानर-सैनिकोंमें जो-जो प्राण धारण करते हैं, उन-उनको हमें चलकर आश्वासन देना चाहिये’ ॥ ६ ॥

> तावुभौ युगपद् वीरौ हनूमद्राक्षसोत्तमौ ।  
> उल्काहस्तौ तदा रात्रौ रणशीर्षे विचेरतुः ॥ ७ ॥

उस समय रात हो गयी थी, इसलिये हनुमान् और राक्षसप्रवर विभीषण दोनों वीर अपने-अपने हाथमें मसाल लिये एक ही साथ रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ७ ॥

> भिन्नलाङ्गूलहस्तोरुपादाङ्गुलिशिरोधरैः ।  
> स्रवद्भिः क्षतजं गात्रैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः ॥ ८ ॥  
> पतितैः पर्वताकारैर्वानरैरभिसंवृताम् ।  
> शस्त्रैश्च पतितैर्दीप्तैर्दहशाते वसुंधराम् ॥ ९ ॥

जिनकी पूँछ, हाथ, पैर, जाँघ, अंगुलि और ग्रीवा आदि अङ्ग कट गये थे, अतएव जो अपने शरीरोंसे रक्त बहा रहे थे, ऐसे पर्वताकार वानरोंके गिरनेसे वहाँकी सारी भूमि सब ओरसे पट गयी थी तथा वहाँ गिरे हुए चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे भी आच्छादित हो गयी थी । हनुमान् और विभीषणने इस अवस्थामें उस युद्धभूमिका निरीक्षण किया ॥ ८-९ ॥

> सुग्रीवमङ्गदं नीलं शरभं गन्धमादनम् ।  
> जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ १० ॥  
> मैन्दं नलं ज्योतिर्मुखं द्विविदं चापि वानरम् ।  
> विभीषणो हनूमांश्च दद्दशाते हतान् रणे ॥ ११ ॥

सुग्रीव, अंगद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख तथा द्विविद—इन सभी वानरोंको हनुमान् और विभीषणने युद्धमें घायल होकर पड़ा देखा ॥ १०-११ ॥

> सप्तषष्टिर्हताः कोट्यो वानराणां तरस्विनाम् ।  
> भद्धः पञ्चमशेषेण वल्लभेन स्वयंभुवः ॥ १२ ॥

ब्रह्माजीके प्रिय अस्त्र—ब्रह्मास्त्रने दिनके चार भाग व्यतीत होते-होते सरसठ करोड़ वानरोंको हताहत कर दिया था । जब केवल पाँचवाँ भाग—सायाह्नकाल शेष रह गया, तब ब्रह्मास्त्रका प्रयोग बंद हुआ था ॥ १२ ॥

> सागरौघनिभं भीमं दृष्ट्वा बाणार्दितं बलम् ।  
> मार्गते जाम्बवन्तं च हनूमान् सविभीषणः ॥ १३ ॥

समुद्रके समान विशाल एवं भयंकर वानर-सेनाको बाणोंसे पीड़ित देख विभीषणसहित हनुमान्जी जाम्बवान्को ढूँढने लगे ॥ १३ ॥

> स्वभावजरया युक्तं वृद्धं शरशतैश्चितम् ।  
> प्रजापतिसुतं वीरं शाम्यन्तमिव पावकम् ॥ १४ ॥  
> दृष्ट्वा समभिसंक्रम्य पौलस्त्यो वाक्यमब्रवीत् ।  
> कच्चिदार्य शरैस्तीक्ष्णैर्न प्राणा ध्वंसितास्तव ॥ १५ ॥

ब्रह्माजीके पुत्र वीर जाम्बवान् एक तो स्वाभाविक वृद्धा-वस्थासे युक्त थे, दूसरे उनके शरीरमें सैकड़ों बाण धँसे हुए थे; अतः वे बुझती हुई आगके समान निस्तेज दिखायी देते थे । उन्हें देखकर विभीषण तुरंत ही उनके पास गये और बोले—‘आर्य ! इन तीखे बाणोंके प्रहारसे आपके प्राण निकल तो नहीं गये ?’ ॥ १४-१५ ॥

> विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवानृक्षपुङ्गवः ।  
> कृच्छ्रादभ्युद्गिरन् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥

विभीषणकी बात सुनकर ऋक्षराज जाम्बवान् बड़ी कठिनाईसे वाक्यका उच्चारण करते हुए इस प्रकार बोले—॥ १६ ॥

> नैर्ऋतेन्द्र महावीर्य स्वरेण त्वाभिलक्षये ।  
> विद्धगात्रः शितैर्बाणैर्न त्वां पश्यामि चक्षुषा ॥ १७ ॥

‘महापराक्रमी राक्षसराज ! मैं केवल स्वरसे तुम्हें पहचान रहा हूँ । मेरे सभी अङ्ग पैने बाणोंसे बिंधे हुए हैं, अतः मैं आँख खोलकर तुम्हें नहीं देख सकता ॥ १७ ॥

> अञ्जना सुप्रजा येन मातरिश्वा च सुव्रत ।  
> हनूमान् वानरश्रेष्ठः प्राणान् धारयते कचित् ॥ १८ ॥

‘उत्तम व्रतके पालक विभीषण ! यह तो बताओ, जिनको जन्म देनेसे अञ्जनादेवी उत्तम पुत्रकी जननी और वायुदेव श्रेष्ठ पुत्रके जनक माने जाते हैं, वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् कहीं जीवित हैं ?’ ॥ १८ ॥

> श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यमुवाचेदं विभीषणः ।  
> आर्यपुत्रावतिक्रम्य कस्मात् पृच्छसि मारुतिम् ॥ १९ ॥

जाम्बवान्का यह प्रश्न सुनकर विभीषणने पूछा— ‘ऋक्षराज ! आप दोनों महाराजकुमारोंको छोड़कर केवल पवनकुमार हनुमान्जीको ही क्यों पूछ रहे हैं ? ॥ १९ ॥

> नैव राजनि सुग्रीवे नाङ्गदे नापि राघवे ।  
> आर्य संदर्शितः स्नेहो यथा वायुसुते परः ॥ २० ॥

‘आर्य ! आपने न तो राजा सुग्रीवपर, न अंगदपर और न भगवान् श्रीरामपर ही वैसा स्नेह दिखाया है, जैसा पवनपुत्र हनुमान्जीके प्रति आपका प्रगाढ़ प्रेम लक्षित हो रहा है’ ॥ २० ॥

> विभीषणवचः श्रुत्वा जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।  
> शृणु नैर्ऋतशार्दूल यस्मात् पृच्छामि मारुतिम् ॥ २१ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा— ‘राक्षसराज ! सुनो । मैं पवनकुमार हनुमान्जीको क्यों पूछता हूँ—यह बता रहा हूँ ॥ २१ ॥

> अस्मिञ्जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम् ।  
> हनूमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि मृता वयम् ॥ २२ ॥

‘यदि वीरवर हनुमान् जीवित हों तो यह मरी हुई सेना भी जीवित ही है—ऐसा समझना चाहिये और यदि उनके प्राण निकल गये हों तो हमलोग जीते हुए भी मृतकके ही तुल्य हैं ॥ २२ ॥

> धरते मारुतिस्तात । मारुतप्रतिमो यदि ।  
> वैश्वानरसमो वीर्ये जीविताशा ततो भवेत् ॥ २३ ॥

‘तात ! यदि वायुके समान वेगशाली और अग्निके समान पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् जीवित हैं तो हम सबके जीवित होनेकी आशा की जा सकती है‘ ॥ २३ ॥

> ततो वृद्धमुपागम्य विनयेनाभ्यवादयत् ।  
> गृह्य जाम्बवतः पादौ हनूमान् मारुतात्मजः ॥ २४ ॥

बूढ़े जाम्बवान्के इतना कहते ही पवनपुत्र हनुमान्जी उनके पास आ गये और दोनों पैर पकड़कर उन्होंने विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया ॥ २४ ॥

> श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं तदा विव्यथितेन्द्रियः ।  
> पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते ऋक्षपुङ्गवः ॥ २५ ॥

हनुमान्जीकी बात सुनकर उस समय ऋक्षराज जाम्बवान्ने, जिनकी सारी इन्द्रियाँ बाणोंके प्रहारसे पीड़ित थीं, अपना पुनर्जन्म हुआ-सा माना ॥ २५ ॥

> ततोऽब्रवीन्महातेजा हनूमन्तं स जाम्बवान् ।  
> आगच्छ हरिशार्दूल वानरांस्त्रातुमर्हसि ॥ २६ ॥

फिर उन महातेजस्वी जाम्बवान्ने हनुमान्जीसे कहा— ‘वानरसिंह ! आओ, सम्पूर्ण वानरोंकी रक्षा करो ॥ २६ ॥

> नान्यो विक्रमपर्याप्तस्त्वमेषां परमः सखा ।  
> त्वत्पराक्रमकालोऽयं नान्यं पश्यामि कंचन ॥ २७ ॥  
> ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय ।  
> विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ ॥ २८ ॥

‘तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पूर्ण पराक्रमसे युक्त नहीं है । तुम्हीं इन सबके परम सहायक हो । यह समय तुम्हारे ही पराक्रमका है । मैं दूसरे किसीको इसके योग्य नहीं देखता ॥ ‘तुम रीछों और वानरवीरोंकी सेनाओंको हर्ष प्रदान करो और बाणोंसे पीड़ित हुए इन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकालकर इन्हें स्वस्थ करो ॥ २८ ॥

> गत्वा परममध्वानमुपर्युपरि सागरम् ।  
> हिमवन्तं नगश्रेष्ठं हनूमन् गन्तुमर्हसि ॥ २९ ॥

‘हनूमन् ! समुद्रके ऊपर-ऊपर उड़कर बहुत दूरका रास्ता तै करके तुम्हें पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर जाना चाहिये ॥ २९ ॥

> ततः काञ्चनमत्युच्चमृषभं पर्वतोत्तमम् ।  
> कैलासशिखरं चात्र द्रक्ष्यस्यरिनिषूदन ॥ ३० ॥  
> तयोः शिखरयोर्मध्ये प्रदीप्तमतुलप्रभम् ।  
> सर्वौषधियुतं वीर द्रक्ष्यस्योषधिपर्वतम् ॥ ३१ ॥

‘शत्रुसूदन ! वहाँ पहुँचनेपर तुम्हें बहुत ही ऊँचे सुवर्णमय उत्तम पर्वत ऋषभका तथा कैलास-शिखरका दर्शन होगा ।३०। ‘वीर ! उन दोनों शिखरोंके बीचमें एक ओषधियोंका पर्वत दिखायी देगा, जो अत्यन्त दीप्तिमान् है । उसमें इतनी चमक है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है । वह पर्वत सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न है ॥ ३१ ॥

> तस्य वानरशार्दूल चतस्रो मूर्ध्नि सम्भवाः ।  
> द्रक्ष्यस्योषधयो दीप्ता दीपयन्तीर्दिशो दश ॥ ३२ ॥

‘वानरसिंह ! उसके शिखरपर उत्पन्न चार ओषधियाँ तुम्हें दिखायी देंगी, जो अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित किये रहती हैं ॥ ३२ ॥

> मृतसंजीवनीं चैव विशल्यकरणीमपि ।  
> सुवर्णकरणीं चैव संधानीं च महौषधीम् ॥ ३३ ॥

‘उनके नाम इस प्रकार हैं—मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी नामक महौषधि ॥ ३३ ॥

> ताः सर्वा हनुमन् गृह्य क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ।  
> आश्वासय हरीन् प्राणैर्योज्य गन्धवहात्मज ॥ ३४ ॥

‘हनुमन् ! पवनकुमार ! तुम उन सब ओषधियोंको लेकर शीघ्र लौट आओ और वानरोंको प्राणदान देकर आश्वासन दो’ ॥ ३४ ॥

> श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ।  
> आपूर्यत बलोद्धर्षैर्वायुवेगैरिवार्णवः ॥ ३५ ॥

जाम्बवान्की यह बात सुनकर वायुनन्दन हनुमान्जी उसी तरह असीम बलसे भर गये, जैसे महासागर वायुके वेगसे व्याप्त हो जाता है ॥ ३५ ॥

> स पर्वततटाग्रस्थः पीडयन् पर्वतोत्तमम् ।  
> हनूमान् दृश्यते वीरो द्वितीय इव पर्वतः ॥ ३६ ॥

वीर हनुमान् एक पर्वतके शिखरपर खड़े हो गये और उस उत्तम पर्वतको पैरोंसे दबाते हुए द्वितीय पर्वतके समान दिखायी देने लगे ॥ ३६ ॥

> हरिपादविनिर्भग्नो निषसाद स पर्वतः ।  
> न शशाक तदात्मानं वोढुं भृशनिपीडितः ॥ ३७ ॥

हनुमान्जीके चरणोंके भारसे पीड़ित हो वह पर्वत धरतीमें धँस गया । अधिक दबाव पड़नेके कारण वह अपने शरीरको भी धारण न कर सका ॥ ३७ ॥

> तस्य पेतुर्नगा भूमौ हरिवेगाच्च जज्वलुः।  
> शृङ्गाणि च व्यकीर्यन्त पीडितस्य हनूमता ॥ ३८ ॥

हनुमान्जीके भारसे पीड़ित हुए उस पर्वतके वृक्ष उन्हींके बेगसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही जल उठे । साथ ही उस पहाड़की चोटियाँ भी ढहने लगीं ॥ ३८ ॥

> तस्मिन् सम्पीड्यमाने तु भग्नद्रुमशिलातले ।  
> न शेकुर्वानराः स्थातुं घूर्णमाने नगोत्तमे ॥ ३९ ॥

हनुमान्जीके दबानेपर वह श्रेष्ठ पर्वत हिलने लगा । उसके वृक्ष और शिलाएँ टूट-फूटकर गिरने लगीं; अतः वानर वहाँ ठहर न सके ॥ ३९ ॥

> सा घूर्णितमहाद्वारा प्रभग्नगृहगोपुरा ।  
> लङ्का त्रासाकुला रात्रौ प्रनृत्तेवाभवत् तदा ॥ ४० ॥

लङ्काका विशाल और ऊँचा द्वार भी हिल गया । मकान और दरवाजे ढह गये । समूची नगरी भयसे व्याकुल हो उस रातमें नाचती-सी जान पड़ी ॥ ४० ॥

> पृथिवीधरसंकाशो निपीड्य पृथिवीधरम् ।  
> पृथिवीं क्षोभयामास सार्णवां मारुतात्मजः ॥ ४१ ॥

पर्वताकार पवनकुमार हनुमान्जीने उस पर्वतको दबाकर पृथ्वी और समुद्रमें भी हलचल पैदा कर दी ॥ ४१ ॥

> आरुरोह तदा तस्माद्गिरिर्मलयपर्वतम् ।  
> मेरुमन्दरसंकाशं नानाप्रस्रवणाकुलम् ॥ ४२ ॥

तदनन्तर वहाँसे आगे बढ़कर वे मेरु और मन्दराचलके समान ऊँचे मलयपर्वतपर चढ़ गये । वह पर्वत नाना प्रकारके झरनोंसे व्याप्त था ॥ ४२ ॥

> नानाद्रुमलताकीर्णं विकासिकमलोत्पलम् ।  
> सेवितं देवगन्धर्वैः षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ ४३ ॥

वहाँ भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ फैली थीं । कमल और कुमुद खिले हुए थे । देवता और गन्धर्व उस पर्वतका सेवन करते थे तथा वह साठ योजन ऊँचा था ॥ ४३ ॥

> विद्याधरैर्मुनिगणैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।  
> नानामृगगणाकीर्णं बहुकन्दरशोभितम् ॥ ४४ ॥

विद्याधर, ऋषि-मुनि तथा अप्सराएँ भी वहाँ निवास करती थीं। अनेक प्रकारके मृगसमूह वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा बहुत-सी कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ४४ ॥

> सर्वानाकुलयंस्तत्र यक्षगन्धर्वकिन्नरान् ।  
> हनुमान् मेघसंकाशो ववृधे मारुतात्मजः ॥ ४५ ॥

पवनकुमार हनुमान्जी वहाँ रहनेवाले यक्ष, गन्धर्व और किन्नर आदि सबको व्याकुल करते हुए मेघके समान बढ़ने लगे ॥ ४५ ॥

> पद्भ्यां तु शैलमापीड्य वडवामुखवन्मुखम् ।  
> विवृत्योग्रं ननादोच्चैस्त्रासयन् रजनीचरान् ॥ ४६ ॥

वे दोनों पैरोंसे उस पर्वतको दबाकर और वडवानलके समान अपने भयंकर मुखको फैलाकर निशाचरोंको डराते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४६ ॥

> तस्य नानद्यमानस्य श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ।  
> लङ्कास्था राक्षसव्याघ्रा न शेकुः स्पन्दितुं क्वचित् ॥ ४७ ॥

उच्च स्वरसे बारंबार गर्जते हुए हनुमान्जीका वह महान् सिंहनाद सुनकर लङ्कावासी श्रेष्ठ राक्षस भयके मारे कहीं हिल-डुल भी न सके ॥ ४७ ॥

> नमस्कृत्वा समुद्राय मारुतिर्भीमविक्रमः ।  
> राघवार्थे परं कर्म समीहत परंतपः ॥ ४८ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले भयानक पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्जीने समुद्रको नमस्कार करके श्रीरामचन्द्रजीके लिये महान् पुरुषार्थ करनेका निश्चय किया ॥ ४८ ॥

> स पुच्छमुद्यम्य भुजङ्गकल्पं  
> विनम्य पृष्ठं श्रवणे निकुच्य ।  
> विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभ-  
> मापुप्लुवे व्योम्नि स चण्डवेगः ॥ ४९ ॥

वे अपनी सर्पाकार पूँछको ऊपर उठाकर पीठको झुकाकर दोनों कान सिकोड़कर और वडवामुख अग्निके समान अपना मुख फैलाकर प्रचण्डवेगसे आकाशमें उड़े ॥ ४९ ॥

> स वृक्षखण्डांस्तरसा जहार  
> शैलाञ्शिलाः प्राकृतवानरांश्च ।  
> बाहूरुवेगोद्धतसम्प्रणुन्ना-  
> स्ते क्षीणवेगाः सलिले निपेतुः ॥ ५० ॥

हनुमान्जी अपने तीव्र वेगसे कितने ही वृक्षों, पर्वत-शिखरों, शिलाओं और वहाँ रहनेवाले साधारण वानरोंको भी साथ-साथ उड़ाते गये । उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे दूर फेंक दिये जानेके कारण जब उनका वेग शान्त हो गया, तब वे वृक्ष आदि समुद्रके जलमें गिर पड़े ॥ ५० ॥

> स तौ प्रसार्योरगभोगकल्पौ  
> भुजौ भुजंगारिनिकाशवीर्यः ।  
> जगाम शैलं नगराजमग्र्यं  
> दिशः प्रकर्षन्निव वायुसूनुः ॥ ५१ ॥

सर्पके शरीरकी भाँति दिखायी देनेवाली अपनी दोनों भुजाओंको फैलाकर गरुड़के समान पराक्रमी पवनपुत्र हनुमान्जी सम्पूर्ण दिशाओंको खींचते हुए-से श्रेष्ठ पर्वत गिरिराज हिमालयकी ओर चले ॥ ५१ ॥

> स सागरं घूर्णितवीचिमालं  
> तदम्भसा भ्रामितसर्वसत्त्वम् ।  
> समीक्षमाणः सहसा जगाम  
> चक्रं यथा विष्णुकराग्रमुक्तम् ॥ ५२ ॥

जिसकी तरंगमालाएँ घूम रही थीं तथा जिसके जलके द्वारा समस्त जल-जन्तु इधर-उधर घुमाये जा रहे थे, उस महासागरको देखते हुए हनुमान्जी भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए चक्रकी भाँति सहसा आगे बढ़ गये ॥ ५२ ॥

> स पर्वतान् पक्षिगणान् सरांसि  
> नदीस्तटाकानि पुरोत्तमानि ।  
> स्फीताञ्जनांस्तानपि सम्प्रवीक्ष्य  
> जगाम वेगात् पितृतुल्यवेगः ॥ ५३ ॥

उनका वेग अपने पिता वायुके ही समान था। वे अनेकानेक पर्वतों, पक्षियों, सरोवरों, नदियों, तालाबों, नगरों तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़ने लगे ॥ ५३ ॥

> आदित्यपथमाश्रित्य जगाम स गतश्रमः ।  
> हनूमांस्त्वरितो वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥ ५४ ॥

वीर हनुमान् अपने पिताके ही तुल्य पराक्रमी और तीव्रगामी थे। वे सूर्यके मार्गका आश्रय ले बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक अग्रसर हो रहे थे ॥ ५४ ॥

> जवेन महता युक्तो मारुतिर्वातरंहसा ।  
> जगाम हरिशार्दूलो दिशः शब्देन नादयन् ॥ ५५ ॥

वानरसिंह पवनकुमार हनुमान् महान् वेगसे युक्त थे। वे सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए वायुके समान वेगसे आगे बढ़े ॥ ५५ ॥

> सरखाम्बवतो वाक्यं मारुतिर्भीमविक्रमः ।  
> ददर्श सहसा चापि हिमवन्तं महाकपिः ॥ ५६ ॥

महाकपि हनुमान्जीका बल-विक्रम बड़ा भयंकर था। उन्होंने जाम्बवान्के वचनोंका स्मरण करते हुए सहसा पहुँचकर हिमालय पर्वतका दर्शन किया ॥ ५६ ॥

> नानाप्रस्रवणोपेतं बहुकन्दरनिर्झरम् ।  
> श्वेताभ्रचयसंकाशैः शिखरैश्चारुदर्शनैः ।  
> शोभितं विविधैर्वृक्षैरगमत् पर्वतोत्तमम् ॥ ५७ ॥

वहाँ अनेक प्रकारके सोते बह रहे थे। बहुत-सी कन्दराएँ और झरने उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति मनोहर दिखायी देनेवाले शिखरों और नाना प्रकारके वृक्षोंसे उस श्रेष्ठ पर्वतकी अद्भुत शोभा हो रही थी। हनुमान्जी उस पर्वतपर पहुँच गये ॥ ५७ ॥

> स तं समासाद्य महानगेन्द्र-  
> मतिप्रवृद्धोत्तमहेमश्टङ्गम् ।  
> ददर्श पुण्यानि महाश्रमाणि  
> सुरर्षिसङ्घोत्तमसेवितानि ॥ ५८ ॥

उस महापर्वतराजका सबसे ऊँचा श्रेष्ठ शिखर सुवर्णमय दिखायी देता था। वहाँ पहुँचकर हनुमान्जीने परम पवित्र बड़े-बड़े आश्रम देखे, जिनमें देवर्षियोंका श्रेष्ठ समुदाय निवास करता था ॥ ५८ ॥

> स ब्रह्मकोशं रजतालयं च  
> शक्रालयं रुद्रशरप्रमोक्षम् ।  
> हयाननं ब्रह्मशिरश्च दीप्तं  
> ददर्श वैवस्वतकिंकरांश्च ॥ ५९ ॥

उस पर्वतपर उन्हें हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माका स्थान, उन्हींके दूसरे स्वरूप रजतनाभिका स्थान, इन्द्रका भवन, जहाँ खड़े होकर रुद्रदेवने त्रिपुरासुरपर बाण छोड़ा था, वह स्थान, भगवान् हयग्रीवका वासस्थान तथा ब्रह्मास्त्र देवताका दीप्तिमान् स्थान—ये सभी दिव्य स्थान दिखायी दिये। साथ ही यमराजके सेवक भी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ ५९ ॥

> वह्न्यालयं वैश्रवणालयं च  
> सूर्यप्रभं सूर्यनिबन्धनं च ।  
> ब्रह्मालयं शंकरकार्मुकं च  
> ददर्श नाभिं च वसुंधरायाः ॥ ६० ॥

इसके सिवा अग्निका, कुबेरका और द्वादश सूर्योंके समावेशका भी सूर्यतुल्य तेजस्वी स्थान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ । चतुर्मुख ब्रह्मा, शंकरजीके धनुष और वसुन्धराकी नाभिके स्थानोंका भी उन्होंने दर्शन किया ॥ ६० ॥

> कैलासमग्र्यं हिमवच्छिलां च  
> तं वै वृषं काञ्चनशैलमग्र्यम् ।  
> प्रदीप्तसर्वौषधिसम्प्रदीप्तं  
> ददर्श सर्वौषधिपर्वतेन्द्रम् ॥ ६१ ॥

तत्पश्चात् श्रेष्ठ कैलासपर्वत, हिमालय-शिला, शिवजीके वाहन वृषभ तथा सुवर्णमय श्रेष्ठ पर्वत ऋषभको भी देखा । इसके बाद उनकी दृष्टि सम्पूर्ण ओषधियोंके उत्तम पर्वतपर पड़ी, जो सब प्रकारकी दीप्तिमती ओषधियोंसे देदीप्यमान हो रहा था ॥ ६१ ॥

> स तं समीक्ष्यानलराशिदीप्तं  
> विसिस्मिये वासवदूतसूनुः ।  
> आप्लुत्य तं चौषधिपर्वतेन्द्रं  
> तत्रौषधीनां विचयं चकार ॥ ६२ ॥

अग्निराशिके समान प्रकाशित होनेवाले उस पर्वतको देखकर पवनकुमार हनुमान्जीको बड़ा विस्मय हुआ । वे कूदकर ओषधियोंसे भरे हुए उस गिरिराजपर चढ़ गये और वहाँ पूर्वोक्त चारों ओषधियोंकी खोज करने लगे ॥ ६२ ॥

> स योजनसहस्राणि समतीत्य महाकपिः ।  
> दिव्यौषधिधरं शैलं व्यचरन्मारुतात्मजः ॥ ६३ ॥

महाकपि पवनपुत्र हनुमान्जी सहस्रों योजन लाँघकर वहाँ आये थे और दिव्य ओषधियोंको धारण करनेवाले उस शैल-शिखरपर विचरण कर रहे थे ॥ ६३ ॥

> महौषध्यस्ततः सर्वास्तस्मिन् पर्वतसत्तमे ।  
> विज्ञायार्थिनमायान्तं ततो जग्मुरदर्शनम् ॥ ६४ ॥

उस उत्तम पर्वतपर रहनेवाली सम्पूर्ण महौषधियाँ यह जानकर कि कोई हमें लेनेके लिये आ रहा है, तत्काल अदृश्य हो गयीं ॥ ६४ ॥

> स ता महात्मा हनुमानपश्यं-  
> श्चुकोप रोषाच्च भृशं ननाद ।  
> अमृष्यमाणोऽग्निसमानचक्षु-  
> र्महीधरेन्द्रं तमुवाच वाक्यम् ॥ ६५ ॥

उन ओषधियोंको न देखकर महात्मा हनुमान्जी कुपित हो उठे और रोषके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे । ओषधियोंका छिपाना उनके लिये असह्य हो गया । उनकी आँखें अग्निके समान लाल हो गयीं और वे उस पर्वतराजसे इस प्रकार बोले—॥ ६५ ॥

> किमेतदेवं सुविनिश्चितं ते  
> यद् राघवे नासि कृतानुकम्पः ।  
> पश्याद्य मद्बाहुबलाभिभूतो  
> विकीर्णमात्मानमथो नगेन्द्र ॥ ६६ ॥

‘नगेन्द्र ! तुम श्रीरघुनाथजीपर भी कृपा नहीं कर सके, ऐसा निश्चय तुमने किस बलपर किया है ? आज मेरे बाहुबलसे पराजित होकर तुम अपने-आपको सब ओर बिखरा हुआ देखो’ ॥ ६६ ॥

> स तस्य शृङ्गं सनगं सनागं  
> सकाञ्चनं धातुसहस्रजुष्टम् ।  
> विकीर्णकूटं ज्वलिताग्रसानुं  
> प्रगृह्य वेगात् सहसोन्ममाथ ॥ ६७ ॥

ऐसा कहकर उन्होंने वेगसे पकड़कर वृक्षों, हाथियों, सुवर्ण तथा अन्य सहस्रों प्रकारकी धातुओंसे भरे हुए उस पर्वतशिखरको ही सहसा उखाड़ लिया । वेगसे उखाड़े जानेके कारण उसकी बहुत-सी चोटियाँ बिखरकर गिर पड़ीं । उस पर्वतका ऊपरी भाग अपनी प्रभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था ॥ ६७ ॥

> स तं समुत्पाट्य खमुत्पपात  
> वित्रास्य लोकान् ससुरासुरेन्द्रान् ।  
> संस्तूयमानः खचरैरनेकै-  
> र्जगाम वेगाद् गरुडोग्रवेगः ॥ ६८ ॥

उसे उखाड़कर साथ ले हनुमान्जी देवेश्वरों और असुरेश्वरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करते हुए गरुड़के समान भयंकर वेगसे आकाशमें उड़ चले । उस समय बहुत-से आकाशचारी प्राणी उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ६८ ॥

> स भास्कराध्वानमनुप्रपन्न-  
> स्तं भास्कराभं शिखरं प्रगृह्य ।  
> वभौ तदा भास्करसंनिकाशो  
> रवेः समीपे प्रतिभास्कराभः ॥ ६९ ॥

सूर्यके समान चमकते हुए उस पर्वतशिखरको हाथमें लेकर हनुमान्जी सूर्यके ही पथपर जा पहुँचे थे । उस समय सूर्यदेवके समीप रहकर उन्हींके समान तेजस्वी शरीरवाले वे पवनकुमार दूसरे सूर्यकी भाँति प्रतीत होते थे ॥ ६९ ॥

> स तेन शैलेन भृशं रराज  
> शैलोपमो गन्धवहात्मजस्तु ।  
> सहस्रधारेण सपावकेन  
> चक्रेण खे विष्णुरिवार्पितेन ॥ ७० ॥  
> तं वानराः प्रेक्ष्य तदा विनेदुः  
> स तानपि प्रेक्ष्य मुदा ननाद ।  
> तेषां समुत्कृष्टरवं निशम्य  
> लङ्कालया भीमतरं विनेदुः ॥ ७१ ॥

वायुदेवताके पुत्र हनुमान्जी पर्वतके समान जान पड़ते थे । उस पर्वतशिखरके साथ उनकी वैसी ही विशेष शोभा हो रही थी, जैसे सहस्रधारोंसे सुशोभित और अग्निकी ज्वालासे युक्त चक्र धारण करनेसे भगवान् विष्णु सुशोभित होते हैं ॥ उस समय उन्हें लौटा देख सब वानर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे । उन्होंने भी उन सबको देखकर बड़े हर्षसे सिंहनाद किया । उन सबके उस तुमुलनादको सुनकर लङ्कावासी निशाचर और भी भयानक स्वरमें चीत्कार करने लगे ॥७१॥

> ततो महात्मा निपपात तस्मिन्  
> शैलोत्तमे वानरसैन्यमध्ये ।  
> हर्युत्तमेभ्यः शिरसाभिवाद्य  
> विभीषणं तत्र च सस्वजे सः ॥ ७२ ॥

तदनन्तर हनुमान्जी उस उत्तम पर्वत त्रिकूटपर कूद पड़े और वानरसेनाके मध्यमें आकर सभी श्रेष्ठ वानरोंको प्रणाम करके विभीषणसे भी उन्हें गले लगाकर मिले ॥ ७२॥

> तावप्युभौ मानुषराजपुत्रौ  
> तं गन्धमाघ्राय महौषधीनाम् ।  
> बभूवतुस्तत्र तदा विशल्या-  
> वुत्तस्थुरन्ये च हरिप्रवीराः ॥ ७३ ॥  
> सर्वे विशल्या विरुजाः क्षणेन  
> हरिप्रवीराश्च हताश्च ये स्युः ।  
> गन्धेन तासां प्रवरौषधीनां  
> सुप्ता निशान्तेष्विव सम्प्रबुद्धाः ॥ ७४ ॥

इसके बाद वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उन महौषधियोंकी सुगंध लेकर स्वस्थ हो गये । उनके शरीरसे बाण निकल गये और घाव भर गये । इसी प्रकार जो दूसरे-दूसरे प्रमुख वानर वीर वहाँ हताहत हुए थे, वे सब-के-सब उन श्रेष्ठ ओषधियोंकी सुगन्धसे रातके अन्तमें सोकर उठे हुए प्राणियोंकी भाँति क्षणभरमें नीरोग हो उठकर खड़े हो गये । उनके शरीरसे बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा जाती रही ॥ ७३-७४ ॥

> यदाप्रभृति लङ्कायां युध्यन्ते हरिराक्षसाः ।  
> तदाप्रभृति मानार्थमाज्ञया रावणस्य च ॥ ७५ ॥  
> ये हन्यन्ते रणे तत्र राक्षसाः कपिकुञ्जरैः ।  
> हता हतास्तु क्षिप्यन्ते सर्वे एव तु सागरे ॥ ७६ ॥

लङ्कामें जबसे वानरों और राक्षसोंकी लड़ाई शुरू हुई, तभीसे वानरवीरोंद्वारा रणभूमिमें जो-जो राक्षस मारे जाते थे, वे सभी रावणकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन मरते-मरते ही समुद्रमें फेंक दिये जाते थे । ऐसा इसलिये होता था कि वानरोंको यह मालूम न हो कि बहुत-से राक्षस मार डाले गये ॥ ७५-७६ ॥

> ततो हरिर्गन्धवहात्मजस्तु  
> तमोषधीशैलमुदग्रवेगः ।  
> निनाय वेगाद्धिमवन्तमेव  
> पुनश्च रामेण समाजगाम ॥ ७७ ॥

तत्पश्चात् प्रचण्ड वेगवाले पवनकुमार हनुमान्जीने पुनः ओषधियोंके उस पर्वतको वेगपूर्वक हिमालयपर ही पहुँचा दिया और फिर लौटकर वे श्रीरामचन्द्रजीसे आ मिले ॥ ७७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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