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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 66"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 66

> स लङ्घयित्वा प्राकारं गिरिकूटोपमो महान् ।  
> निर्ययौ नगरात् तूर्णं कुम्भकर्णो महाबलः ॥ १ ॥

महाबली कुम्भकर्ण पर्वत-शिखरके समान ऊँचा और विशालकाय था । वह परकोटा लाँघकर बड़ी तेजीके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥

> ननाद च महानादं समुद्रमभिनादयन् ।  
> विजयन्निव निर्घातान् विधमन्निव पर्वतान् ॥ २ ॥

बाहर आकर पर्वतोंको कँपाता और समुद्रको गुँजाता हुआ-सा वह उच्च स्वरसे गम्भीर नाद करने लगा । उसकी वह गर्जना बिजलीकी कड़कको भी मात कर रही थी ॥ २ ॥

> तमवध्यं मघवता यमेन वरुणेन वा ।  
> प्रेक्ष्य भीमाक्षमायान्तं वानरा विप्रदुद्रुवुः ॥ ३ ॥

इन्द्र, यम अथवा वरुणके द्वारा भी उसका वध होना असम्भव था । उस भयानक नेत्रवाले निशाचरको आते देख सभी वानर भाग खड़े हुए ॥ ३ ॥

> तांस्तु विप्रद्रुतान् दृष्ट्वा राजपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।  
> नलं नीलं गवाक्षं च कुमुदं च महाबलम् ॥ ४ ॥

उन सबको भागते देख राजकुमार अंगदने नल, नील, गवाक्ष और महाबली कुमुदको सम्बोधित करके कहा—॥ ४ ॥

> आत्मनस्तानि विस्मृत्य वीर्याण्यभिजनानि च ।  
> क गच्छत भयत्रस्ताः प्राकृता हरयो यथा ॥ ५ ॥

‘वानर वीरो ! अपने उत्तम कुलों और उन अलौकिक पराक्रमोंको भुलाकर साधारण बंदरोंकी भाँति भयभीत हो तुम कहाँ भागे जा रहे हो ? ॥ ५ ॥

> साधु सौम्या निवर्तध्वं किं प्राणान् परिरक्षथ ।  
> नालं युद्धाय वै रक्षो महतीयं विभीषिका ॥ ६ ॥

‘सौम्य स्वभाववाले बहादुरो ! अच्छा होगा कि तुम लौट आओ । क्यों जान बचानेके फेरमें पड़े हो ? यह राक्षस हमारे साथ युद्ध करनेकी शक्ति नहीं रखता । यह तो इसकी बड़ी भारी विभीषिका है—इसने मायासे विशाल रूप धारण करके तुम्हें डरानेके लिये व्यर्थ घटाटोप फैला रक्खा है ॥ ६ ॥

> महतीमुत्थितामेनां राक्षसानां विभीषिकाम् ।  
> विक्रमाद् विधमिष्यामो निवर्तध्वं प्लवङ्गमाः ॥ ७ ॥

‘अपने सामने उठी हुई राक्षसोंकी इस बड़ी भारी विभीषिकाको हम अपने पराक्रमसे नष्ट कर देंगे । अतः वानरवीरो ! लौट आओ’ ॥ ७ ॥

> कृच्छ्रेण तु समाश्वस्य संगम्य च ततस्ततः ।  
> वृक्षान् गृहीत्वा हरयः सम्प्रतस्थू रणाजिरे ॥ ८ ॥

तब वानरोंने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण किया और जहाँ-तहाँसे एकत्र हो हाथोंमें वृक्ष लेकर वे रणभूमिकी ओर चले ॥ ८ ॥

> ते निवर्त्य तु संरब्धाः कुम्भकर्णं वनौकसः ।  
> निजघ्नुः परमक्रुद्धाः समदा इव कुञ्जराः ॥ ९ ॥  
> प्रांशुभिर्गिरिशृङ्गैश्च शिलाभिश्च महाबलाः ।  
> पादपैः पुष्पिताग्रैश्च हन्यमानो न कम्पते ॥ १० ॥

लौटनेपर वे महाबली वानर मतवाले हाथियोंकी भाँति अत्यन्त क्रोध और रोषसे भर गये और कुम्भकर्णके ऊपर ऊँचे-ऊँचे पर्वतीय-शिखरों, शिलाओं तथा खिले हुए वृक्षोंसे प्रहार करने लगे । उनकी मार खाकर भी कुम्भकर्ण विचलित नहीं होता था ॥ ९-१० ॥

> तस्य गात्रेषु पतिता भिद्यन्ते बहवः शिलाः ।  
> पादपाः पुष्पिताग्राश्च भग्नाः पेतुर्महीतले ॥ ११ ॥

उसके अङ्गोंपर गिरी हुई बहुतेरी शिलाएँ चूर-चूर हो जाती थीं और वे खिले हुए वृक्ष भी उसके शरीरसे टकराते ही टूक-टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ११ ॥

> सोऽपि सैन्यानि संक्रुद्धो वानराणां महौजसाम् ।  
> ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः ॥ १२ ॥

उधर क्रोधसे भरा हुआ कुम्भकर्ण भी अत्यन्त सावधान हो महाबली वानरोंकी सेनाओंको उसी प्रकार रौंदने लगा, जैसे बढ़ा हुआ दावानल बड़े-बड़े जंगलोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ १२ ॥

> लोहितार्द्रास्तु बहवः शेरते वानरर्षभाः ।  
> निरस्ताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः ॥ १३ ॥

बहुत-से श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ हो धरतीपर सो गये । जिन्हें उठाकर उसने ऊपर फेंक दिया, वे लाल फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥

> लङ्घयन्तः प्रधावन्तो वानरा नावलोकयन् ।  
> केचित् समुद्रे पतिताः केचिद् गगनमास्थिताः ॥ १४ ॥

वानर ऊँची-नीची भूमिको लाँघते हुए जोर-जोरसे भागने लगे । वे आगे-पीछे और अगल-बगलमें कहीं भी दृष्टि नहीं डालते थे । कोई समुद्रमें गिर पड़े और कोई आकाशमें ही उड़ते रह गये ॥ १४ ॥

> वध्यमानास्तु ते वीरा राक्षसेन च लीलया ।  
> सागरं येन ते तीर्णाः पथा तेनैव दुद्रुवुः ॥ १५ ॥

उस राक्षसने खेल-खेलमें ही जिन्हें मारा, वे वीर वानर जिस मार्गसे समुद्र पार करके लङ्कामें आये थे, उसी मार्गसे भागने लगे ॥ १५ ॥

> ते स्थलानि तदा निम्नं विवर्णवदना भयात् ।  
> ऋक्षा वृक्षान् समारूढाः केचित् पर्वतमाश्रिताः ॥ १६ ॥  
> ममज्जुरर्णवे केचिद् गुहाः केचित् समाश्रिताः ।  
> निपेतुः केचिदपरे केचिन्नैवावतस्थिरे ।  
> केचिद् भूमौ निपतिताः केचित् सुप्ता मृता इव ॥ १७ ॥  
> तान् समीक्ष्याङ्गदो भग्नान् वानरानिदमब्रवीत् ।  
> अवतिष्ठत युध्यामो निवर्तध्वं प्लवंगमाः ॥ १८ ॥

भयके मारे वानरोंके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी । वे नीची जगह देख-देखकर भागने और छिपने लगे । कितने ही रीछ वृक्षोंपर जा चढ़े और कितनोंने पर्वतोंकी शरण ली ॥ कितने ही वानर और भालू समुद्रमें डूब गये । कितनोंने पर्वतोंकी गुफाओंका आश्रय लिया । कोई गिरे, कोई एक स्थानपर खड़े न रह सके, इसलिये भागे । कुछ धराशायी हो गये और कोई-कोई मुर्दोंके समान साँस रोककर पड़ गये ॥ उन वानरोंको भागते देख अंगदने इस प्रकार कहा— ‘वानरवीरो ! ठहरो, लौट आओ । हम सब मिलकर युद्ध करेंगे ॥ १८ ॥

> भग्नानां वो न पश्यामि परिक्रम्य महीमिमाम् ।  
> स्थानं सर्वे निवर्तध्वं किं प्राणान् परिरक्षथ ॥ १९ ॥

‘यदि तुम भाग गये तो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके भी कहीं तुम्हें ठहरनेके लिये स्थान मिल सके, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता ( सुग्रीवकी आज्ञाके बिना कहीं भी जानेपर तुम जीवित नहीं बच सकोगे ) । इसलिये सब लोग लौट आओ । क्यों अपने ही प्राण बचानेकी फिक्रमें पड़े हो? ॥१९॥

> निरायुधानां क्रमतामसङ्गगतिपौरुषाः ।  
> दारा ह्युपहसिष्यन्ति स वै घातः सुजीवताम् ॥ २० ॥  
> कुलेषु जाताः सर्वेऽस्मिन् विस्तीर्णेषु महत्सु च ।  
> क गच्छत भयत्रस्ताः प्राकृता हरयो यथा ।  
> अनार्याः खलु यद्वीतास्त्यक्त्वा वीर्यं प्रधावत ॥ २१ ॥

‘तुम्हारे वेग और पराक्रमको कोई रोकनेवाला नहीं है । यदि तुम हथियार डालकर भाग जाओगे तो तुम्हारी स्त्रियाँ ही तुमलोगोंका उपहास करेंगी और वह उपहास जीवित रहनेपर भी तुम्हारे लिये मृत्युके समान दुःखदायी होगा ॥ ‘तुम सब लोग महान् और बहुत दूरतक फैले हुए श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए हो । फिर साधारण वानरोंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो ? यदि तुम पराक्रम छोड़कर भयके कारण भागते हो तो निश्चय ही अनार्य समझे जाओगे ॥ २१ ॥

> विकत्थनानि वो यानि भवद्भिर्जनसंसदि ।  
> तानि वः क नु यातानि सोदग्राणि हितानि च ॥ २२ ॥

‘तुम जन-समुदायमें बैठकर जो डींग हाँका करते थे कि हम बड़े प्रचण्ड वीर हैं और स्वामीके हितैषी हैं, तुम्हारी वे सब बातें आज कहाँ चली गयीं ? ॥ २२ ॥

> भीरोः प्रवादाः श्रूयन्ते यस्तु जीवति धिक्कृतः ।  
> मार्गः सत्पुरुषैर्जुष्टः सेव्यतां त्यज्यतां भयम् ॥ २३ ॥

‘जो सत्पुरुषोंद्वारा धिक्कृत होकर भी जीवन धारण करता है; उसके उस जीवनको धिक्कार है, इस तरहके निन्दात्मक वचन कायरोंको सदा सुनने पड़ते हैं । इसलिये तुमलोग भय छोड़ो और सत्पुरुषोंद्वारा सेवित मार्गका आश्रय लो ॥ २३ ॥

> शयामहे वा निहताः पृथिव्यामल्पजीविताः ।  
> प्राप्नुयामो ब्रह्मलोकं दुष्प्रापं च कुयोधिभिः ॥ २४ ॥

‘यदि हमलोग अल्पजीवी हों और शत्रुके द्वारा मारे जाकर रणभूमिमें सो जायँ तो हमें उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होगी, जो कुयोगियोंके लिये परम दुर्लभ है ॥ २४ ॥

> अवाप्नुयामः कीर्तिं वा निहत्वा शत्रुमाहवे ।  
> निहता वीरलोकस्य भोक्ष्यामो वसु वानराः ॥ २५ ॥

‘वानरो ! यदि युद्धमें हमने शत्रुको मार गिराया तो हमें उत्तम कीर्ति मिलेगी और यदि स्वयं ही मारे गये तो हम वीरलोकके वैभवका उपभोग करेंगे ॥ २५ ॥

> न कुम्भकर्णः काकुत्स्थं दृष्ट्वा जीवन् गमिष्यति ।  
> दीप्यमानमिवासाद्य पतङ्गो ज्वलनं यथा ॥ २६ ॥

‘श्रीरघुनाथजीके सामने जानेपर कुम्भकर्ण जीवित नहीं लौट सकेगा; ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निके पास पहुँचकर पतङ्ग भस्म हुए बिना नहीं रह सकता ॥ २६ ॥

> पलायनेन चोद्दिष्टाः प्राणान् रक्षामहे वयम् ।  
> एकेन बहवो भग्ना यशो नाशं गमिष्यति ॥ २७ ॥  
> एवं ब्रुवाणं तं शूरमङ्गदं कनकाङ्गदम् ।  
> द्रवमाणास्ततो वाक्यमूचुः शूरविगर्हितम् ॥ २८ ॥

‘यदि हमलोग प्रख्यात वीर होकर भी भागकर अपने प्राण बचायेंगे और अधिक संख्यामें होकर भी एक योद्धाका सामना नहीं कर सकेंगे तो हमारा यश मिट्टीमें मिल जायगा’ ॥ सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले शूरवीर अङ्गद जब ऐसा कह रहे थे, उस समय उन भागते हुए वानरोंने उन्हें ऐसा उत्तर दिया, जिसकी शौर्य-सम्पन्न योद्धा सदा निन्दा करते हैं ॥ २८ ॥

> कृतं नः कदनं घोरं कुम्भकर्णेन रक्षसा ।  
> न स्थानकालो गच्छामो दयितं जीवितं हि नः ॥ २९ ॥

वे बोले—‘राक्षस कुम्भकर्णने हमारा घोर संहार मचा रखा है; अतः यह ठहरनेका समय नहीं है । हम जा रहे हैं; क्योंकि हमें अपनी जान प्यारी है’ ॥ २९ ॥

> एतावदुक्त्वा वचनं सर्वे ते भेजिरे दिशः ।  
> भीमं भीमाक्षमायान्तं दृष्ट्वा वानरयूथपाः ॥ ३० ॥

इतनी बात कहकर भयानक नेत्रवाले भीषण कुम्भकर्णको आते देख उन सब वानर-यूथपतियोंने विभिन्न दिशाओंकी शरण ली ॥ ३० ॥

> द्रवमाणास्तु ते वीरा अङ्गदेन वलीमुखाः ।  
> सान्त्वनैश्चानुमानैश्च ततः सर्वे निवर्तिताः ॥ ३१ ॥

तब उन भागते हुए सभी वीर वानरोंको अङ्गदने सान्त्वना और आदर-सम्मानके द्वारा लौटाया ॥ ३१ ॥

> प्रहर्षमुपनीताश्च वालिपुत्रेण धीमता ।  
> आज्ञाप्रतीक्षास्तस्थुश्च सर्वे वानरयूथपाः ॥ ३२ ॥

बुद्धिमान् वालिपुत्रने उन सबको प्रसन्न कर लिया । वे सब वानरयूथपति सुग्रीवकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये ॥ ३२ ॥

> ऋषभशरभमैन्दधूम्रनीलाः  
> कुमुदसुषेणगवाक्षरम्भताराः ।  
> द्विविदपनसवायुपुत्रमुख्या-  
> स्त्वरितत राभिमुखं रणं प्रयाताः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर ऋषभ, शरभ, मैन्द, धूम्र, नील, कुमुद, सुषेण, गवाक्ष, रम्भ, तार, द्विविद, पनस और वायुपुत्र हनुमान् आदि श्रेष्ठ वानर-वीर तुरंत ही कुम्भकर्णका सामना करनेके लिये रणक्षेत्रकी ओर बढ़े ॥ ३३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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